
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से दस दिवसीय गणेश उत्सव की शुरुआत होने जा रही है। देश भर में गणपति बप्पा के स्वागत और स्थापना की तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं।
प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश की पूजा में वैसे तो मोदक, लड्डू, लाल पुष्प और हरी दूर्वा विशेष रूप से अर्पित की जाती है। परंतु, शास्त्रों में गणेश जी की पूजा में तुलसी (तुलसी पत्र) चढ़ाना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। इसके पीछे एक अत्यंत पौराणिक कथा और श्राप जुड़ा हुआ है।
गणेश चतुर्थी 2026: शुभ तिथि और पूजा का मुहूर्त
1. गणेश जी की ध्यान साधना और तुलसी जी का आगमन
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान श्री गणेश नदी के तट पर परम ध्यान में लीन थे। उनका रूप अत्यंत तेजस्वी, सुंदर वस्त्रों और दिव्य मालाओं से सुशोभित था। उसी समय वहाँ से देवी तुलसी गुजर रही थीं। बप्पा के इस अलौकिक रूप को देखकर तुलसी जी उन पर मोहित हो गईं और उनके मन में गणेश जी से विवाह करने की इच्छा जागृत हुई। विवाह का प्रस्ताव रखने के उद्देश्य से तुलसी जी ने गणेश जी का ध्यान भंग कर दिया।
2. विवाह प्रस्ताव और परस्पर श्राप
ध्यान टूटने पर जब गणेश जी ने आंखें खोलीं, तो तुलसी जी ने उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। गणेश जी ने स्वयं को ब्रह्मचारी बताते हुए अत्यंत विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
इस अस्वीकृति से क्रोधित होकर तुलसी जी ने गणेश जी को श्राप दे दिया- आपकी इच्छा के विरुद्ध आपके दो विवाह होंगे। अकारण मिले इस श्राप से क्रोधित होकर गणेश जी ने भी पलटकर तुलसी जी को श्राप दे दिया- तुम्हारा विवाह किसी देवता से नहीं, बल्कि एक असुर (दैत्य) से होगा।
3. क्षमा याचना और गणेश जी का वरदान
एक असुर की पत्नी बनने का भयंकर श्राप सुनते ही तुलसी जी का क्रोध शांत हो गया और उन्हें अपनी भूल का पश्चाताप हुआ। उन्होंने तुरंत श्री गणेश के चरणों में झुककर क्षमा याचना की। तुलसी जी की सच्ची प्रार्थना से प्रसन्न होकर गणेश जी ने कहा- तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की अतिप्रिय बनोगी तथा कलयुग में मोक्ष प्रदान करने वाली कहलाओगी। तुम्हारा विवाह शंखचूड़ नाम के असुर से होगा, जो पूर्व जन्म में एक दानव था।
4. पूजा में तुलसी निषेध का नियम
श्राप का निवारण करते हुए गणेश जी ने यह भी स्पष्ट किया—"परंतु, मेरी पूजा में तुम्हारा प्रयोग सदैव वर्जित रहेगा। जो व्यक्ति मुझे तुलसी पत्र अर्पित करेगा, उसकी पूजा निष्फल मानी जाएगी।"
यही कारण है कि गणेश चतुर्थी हो या बप्पा की कोई भी नियमित पूजा, गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए केवल हरी दूर्वा (दूब घास) ही अर्पित करने का विधान है।
(नोट: यह जानकारी पौराणिक कथाओं, धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों पर आधारित है।)
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