इंदौर। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 24 सितंबर को होने वाले वन-डे मैच में बारिश से व्यवधान की संभावना है। इंदौर में अब तक 13 अंतरराष्ट्रीय वन-डे मैच खेले गए हैं, लेकिन पहली बार किसी मैच का फैसला डकवर्थ-लुईस पद्धति से हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बारिश से बाधित मैचों में इस पद्धति का इस्तेमाल सालों से हो रहा है। हैरानी की बात है कि ब्रिटिश सांख्यिकविद फ्रेंक डकवर्थ और टोनी लुईस का क्रिकेट से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन उनके बताए फॉर्मूले पर विश्व क्रिकेट चल रहा है। उनके रिटायरमेंट के बाद प्रोफेसर स्टीवन स्टर्न इस पद्धति के कर्ताधर्ता बनें, लेकिन उनके नाम से दुनिया अब भी अनजान है। उन्होंने भी इसमें कुछ बदलाव किए। वर्ष 2014 में इस पद्धति को डकवर्थ-लुईस-स्टर्न पद्धति (डीएलएस पद्धति) कहा जाने लगा।
डकवर्थ-लुईस पद्धति सीमित ओवरों के अंतरराष्ट्रीय मैचों में बारिश के बाद दूसरी पारी में खेलने वाली टीम को निर्धारित ओवरों में संशोधित लक्ष्य देने के लिए उपयोग होती है, जो पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम द्वारा बारिश की बाधा से पहले दिए लक्ष्य के समान ही मुश्किल होता है। इस नियम से पहले कई पद्धतियों को आजमाया गया, जिसमें से सबसे ज्यादा उपयोग औसत रन रेट पद्धति और सबसे ज्यादा रन उगलने वाले ओवरों का था। इन सभी में किसी न किसी तरह से टीमों को नुकसान भी होता रहा। बाद में डकवर्थ-लुईस पद्धति को सभी ने उनकी तुलना में सटीक मानते हुए अपना लिया।
इस पद्धति का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहली बार उपयोग 1 जनवरी 1997 को जिम्बाब्वे व इंग्लैंड के बीच दूसरे वन-डे में किया गया था, जिसमें जिम्बाब्वे 7 रनों से जीता था। आईसीसी ने 1999 में इस पद्धति को आधिकारिक तौर पर अपनाया। बाद में इसमें और सुधार किए गए।
घरेलू मैचों में भारतीय इंजीनियर की पद्धति से होता है मैचों का फैसला : भारत के घरेलू सत्र के वर्षाबाधित सीमित ओवरों के मैचों में डकवर्थ-लुईस पद्धति उपयोग नहीं होती। भारत में वीजेडी या विजयन पद्धति का उपयोग किया जाता है। इसे त्रिचुर (केरल) के सिविल इंजीनियर वी. जयदेवन ने तैयार किया। वीजेडी पद्धति पुराने मैचों के आंकड़ों के आधार पर चलता है।
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