
डिजिटल डेस्क, नईदुनिया। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव (UP Assembly Elections 2027) से करीब आठ माह पहले हुए योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल विस्तार को भाजपा की बड़ी चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी की तैयारी में जुटी भाजपा (BJP Strategy) ने इस विस्तार के जरिए जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने का प्रयास किया है। खासतौर पर समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले का जवाब देने के लिए भाजपा ने ओबीसी (OBC) और दलित वर्ग (SC/ST) को अधिक प्रतिनिधित्व देकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की है।
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समाजवादी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए जाट, गुर्जर, पाल, वाल्मीकि, पासी और अन्य पिछड़ी व दलित जातियों में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए इसी रणनीति की काट निकालने का प्रयास किया है। विस्तार में तीन नए ओबीसी चेहरों को मंत्री बनाया गया, जबकि दो मंत्रियों को प्रोन्नत किया गया है। इसके साथ ही दलित समाज से भी दो नए चेहरों को शामिल किया गया।
BJP का मानना है कि गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित वोट बैंक आगामी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएगा। इसी वजह से मंत्रिमंडल विस्तार में जातीय प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी गई।
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कुल 60 मंत्रियों वाले मंत्रिमंडल में लगभग 60 प्रतिशत प्रतिनिधित्व ओबीसी और अनुसूचित जाति समाज का हो गया है। भाजपा ने इस कदम के जरिए यह संकेत देने की कोशिश की है कि पार्टी सामाजिक संतुलन के साथ आगे बढ़ रही है।

विस्तार के बाद पिछड़े समाज से आने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़कर 25 हो गई है। इनमें उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी शामिल हैं। वहीं अनुसूचित जाति और जनजाति समाज से 11 मंत्री मंत्रिमंडल में हैं।
भाजपा ने केवल पिछड़े और दलित वर्ग पर ही फोकस नहीं किया, बल्कि सवर्ण समाज को भी संतुलित रखने का प्रयास किया है। पार्टी ने सवर्ण समाज से मनोज पाण्डेय को कैबिनेट मंत्री बनाकर ब्राह्मण समाज में उठ रही नाराजगी को कम करने की कोशिश की है।
बताया जा रहा है कि यूजीसी समेत अन्य मुद्दों को लेकर सवर्ण समाज के कुछ वर्गों में असंतोष था। ऐसे में मनोज पाण्डेय को मंत्री बनाना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

वर्तमान मंत्रिमंडल में सवर्ण समाज से 22 मंत्री हैं। इनमें ब्राह्मण समाज के आठ, राजपूत समाज के छह, वैश्य समाज के चार, भूमिहार समाज के दो और खत्री व कायस्थ समाज से एक-एक मंत्री शामिल हैं।
चुनाव में पिछड़े वर्ग की निर्णायक भूमिका को देखते हुए भाजपा ने कई प्रभावशाली OBC जातियों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया है। इनमें लोध समाज से कैलाश राजपूत, पाल समाज से अजीत सिंह, विश्वकर्मा समाज से हंसराज, गुर्जर समाज से सोमेन्द्र तोमर और जाट समाज से भूपेन्द्र चौधरी को प्रतिनिधित्व दिया गया है।

इसके पहले भाजपा पिछड़े वर्ग से आने वाले पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दे चुकी है। पार्टी की रणनीति साफ है कि गैर-यादव पिछड़ा वर्ग को अपने पक्ष में मजबूती से बनाए रखा जाए।
अनुसूचित जाति वर्ग में BJP ने पहली बार वाल्मीकि समाज से सुरेन्द्र दलेर और पासी समाज से कृष्णा पासवान को मंत्रिमंडल में जगह दी है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह केवल पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे और प्रभावशाली सामाजिक समूहों को भी बराबर महत्व दे रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव 2024 में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन ने पीडीए फार्मूले के जरिए भाजपा को झटका दिया था। इसी अनुभव के आधार पर भाजपा अब पिछड़े और दलित वर्ग के बीच अपनी पकड़ और मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
विधानसभा चुनाव से पहले बने नए मंत्रियों को लंबा कार्यकाल नहीं मिलेगा, लेकिन भाजपा इस विस्तार के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश देने में सफल रही है। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संकेत दिया है कि संगठन और सरकार में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर आधारित रही है। यही कारण है कि भाजपा ने इस विस्तार में क्षेत्रीय संतुलन के साथ जातीय समीकरणों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है।
मंत्रिमंडल विस्तार से पहले एनडीए के सहयोगी दल लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग कर रहे थे। इसके लिए कई नेताओं ने दिल्ली तक संपर्क साधा था, लेकिन दूसरे विस्तार में किसी भी सहयोगी दल को नया मौका नहीं मिला।
इसके बावजूद सहयोगी दलों की ओर से किसी प्रकार की नाराजगी खुलकर सामने नहीं आई। माना जा रहा है कि बिहार, बंगाल, असम और पुडुचेरी विधानसभा चुनाव में भाजपा के अच्छे प्रदर्शन के बाद सहयोगी दल दबाव बनाने से बच रहे हैं। सहयोगी दलों को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के पक्ष में बना माहौल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी असर दिखा सकता है। ऐसे में भाजपा से दूरी बनाना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है।
भाजपा ने वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में अपना दल (सोनेलाल) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था। सरकार बनने के बाद दोनों दलों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में निषाद पार्टी भी भाजपा के साथ जुड़ी। हालांकि बाद में मंत्री पद से हटाए जाने के बाद सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने भाजपा से अलग होकर समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ा था।
वर्ष 2022 विधानसभा चुनाव में अपना दल और निषाद पार्टी भाजपा के साथ बनी रहीं, जबकि सुभासपा ने सपा के साथ चुनाव लड़ा। बाद में राजभर ने फिर भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय लोकदल भी भाजपा के साथ आ गया। वर्तमान में भाजपा के सहयोगी दलों का एक-एक विधायक योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री पद संभाल रहा है।