18 दिन चले महाभारत के युद्ध की सबसे बड़ी वजह धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन भी थे। आइए जानते है क्यों मुश्किल था युद्ध में दुर्योधन को पराजित कर पाना?
दुर्योधन का पूरा जीवन सिर्फ सत्ता की लालसा में निकला था। वह हमेशा से ही पांडवों से नफरत करता था और उन्हें हस्तिनापुर से बाहर निकालना चाहता था।
जब महाभारत युद्ध से पहले श्री कृष्ण हस्तिनापुर में युद्ध के बदले राजा धृतराष्ट्र से मात्र 5 गांव मांगते है, तो दुर्योधन पांच पांडवों को 5 गांव देने से भी मना कर देते है।
दुर्योधन 5 गांव देने की मांग के बदले में कहते है कि वह पांडवों को सुई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं देंगे। ऐसे में यह पक्का हो गया था कि महाभारत का युद्ध होना तय है।
दुर्योधन की लालसा और मूर्खता के चलते युद्ध भूमि में माता गांधारी के 100 पुत्रों की मृत्यु हुई थी। 100 कौरवों के अलावा इस महायुद्ध में भीष्म, गुरु द्रोण और कई बड़े शूरवीरों की मृत्यु हुई थी।
जब युद्ध भूमि में कौरव बुरी तरह पराजित हो रहे थे और हारने के करीब थे, तब माता गांधारी ने अपने नेत्रों से पट्टी हटाकर दुर्योधन को ऊपर से लेकर नीचे तक देखा था।
गांधारी ने अपने जीवन भर के पुण्य से दुर्योधन का शरीर वज्र का कर दिया था। इस आशीर्वाद के बाद युद्ध भूमि में दुर्योधन को कोई भी पराजित नहीं कर पा रहा था। ऐसे में श्री कृष्ण की लीला के चलते दुर्योधन ने अपने पैर पर पत्ते लपेट लिए थे।
दुर्योधन का शरीर वज्र का हो जाने पर उसकी सिर्फ एक ही कमजोरी बची थी कि उसके पैर पर वार किया जाए। भीषण युद्ध के पश्चात दुर्योधन की कमजोरी पता लगने पर भीष्म ने उसे हराया था।