
नई दिल्ली। देशभर में 500 और 1000 के नोट बंद होने के बाद लोगों को थोड़ी परेशानी हो रही है। भारत में कागजी मुद्रा का इतिहास ब्रिटिश काल से है। आज हम आपको बता रहे हैं कागजी मुद्रा के भारत में प्रचलन की शुरुआत कहां से हुई और कैसे इसका क्रमिक विकास हुआ...
दरअसल, कागजी नोटों का प्रयोग पहली बार ब्रिटिश सरकार ने किया था। 18वीं सदी तक देश में लेन देन के लिए सोने और चांदी के सिक्कों का ही प्रयोग होता था। प्राइवेट यूरोपियन ट्रेडिंग कंपनी ने जब भारत में अपने बैंक (जैसे कलकत्ता में बैंक ऑफ हिदोस्तान) स्थापित किए, तो उन्होंने पहली भारतीय मुद्रा का परिचालन शुरू किया। इन नोटों पर टेक्स्ट लिखा होता था।
ब्रिटिश कंपनियों ने जैसे ही बंगाल, बॉम्बे और मद्रास में अपना कब्जा मजबूत किया, उन्होंने प्रेसीडेंसी बैंक्स की स्थापना करना शुरू कर दिया, जिसकी शुरूआत बैंक ऑफ बंगाल से हुई। इसने कागजी मुद्रा को लोगों में अधिक लोकप्रिय कर दिया। बैंक ऑफ बंगाल ने नोटों पर महिला की छोटी तस्वीर लगाना शुरू कर दिया, जो कॉमर्स का प्रतीक था।
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इसके साथ ही नोट पर बैंक का नाम और उसका मूल्य उर्दू, बंगाली और नागरी भाषा में लिखा होता था। हालांकि, 1861 के पेपर करेंसी एक्ट के बाद में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार नोटों के निर्माण में लगी। उसी ने उस पेपर करेंसी की शुरुआत की, जिसे आज हम जानते हैं।

नया कानून जेम्स विल्सन के दिमाग की उपज थी, जो भारत में ब्रिटिश को सलाह देने वाली भारत परिषद के फाइनेंस मेंबर थे। उन्होंने 1843 में इकोनॉमिस्ट अखबार की स्थापना की और वह स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के संस्थापक निदेशक भी थे।
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'विक्टोरिया पोर्ट्रेट श्रृंखला' के नोट पहली कागजी मुद्रा थी, जिसे सरकार ने आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया था। ये नोट 10 रुपए, 20 रुपए, 50 रुपए, 100 रुपए और 1,000 रुपए के मूल्यवर्ग में उपलब्ध थे। नोट दो भाषाओं में उपलब्ध कराए गए थे और उस पर क्वीन की तस्वीर होती थी।

जैसे-जैसे भारत पर ब्रिटिश प्रभाव बाद के वर्षों में बढ़ता गया, भारत में नोटों की शैली विकसित होती गई। वर्ष 1923 में जॉर्ज पंचम की तस्वीर के साथ ही अधिक भाषाओं और विवरण वाले नोट प्रकाशित हुए।
इन सभी नोटों को बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा मुद्रित किया जाता था। भारत की पहली मुद्रा प्रिंटिंग प्रेस 1928 में नासिक में स्थापित की गई। इसके चार साल बाद भारत में चलने वाले सभी नोटों को मुद्रित करने लगी। सन् 1935 में भारत के पैसे के प्रबंधन की जिम्मेदारी नवस्थापित भारतीय रिजर्व बैंक को सौंप दी गई।