
France in Niger: अफ्रीकी देश नाइजर में ताजा तख्तापलट के बाद फ्रांस ने अपने नागरिकों को वहां से निकालने का फैसला किया है। इसमें उन यूरोपीय नागरिकों को भी शामिल किया जाएगा, जो देश छोड़ना चाहते हैं। बता दं कि हाल ही में सेना ने वहां के राष्ट्रपति मोहम्मद बजौम को हटाकर सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इसके बाद से फ्रांस के लिए स्थिति बदतर होती जा रही है। गुस्साए लोगों ने फ्रांसीसी दूतावास पर भी हमला किया। इसके अलावा मौजूदा सैन्य शासन ने फ्रांस को यूरेनियम की आपूर्ति बंद कर दी है और रूस का सहयोग लेने का फैसला किया है।

दरअसल नाइजर पहले फ्रांस का उपनिवेश था। आजादी मिलने के बाद भी फ्रांस यहां जमा रहा और यहां के संसाधनों का लाभ उठाता रहा है। फ्रांस का समर्थन करने की वजह से नाइजर के लोग, राष्ट्रपति मोहम्मद बजौम के खिलाफ हो गये थे। इसके अलावा बजौम पर आरोप लगता है कि वे देश के मूल निवासी नहीं, बल्कि बाहरी हैं। अरब माइनोरिटी ग्रुप से जुड़े बजौम को स्थानीय लोगों ने कभी स्वीकार नहीं किया। वहीं, जनता भी सरकार के कामकाज से खुश नहीं थी। ये देश अलकायदा, इस्लामिक स्टेट और बोको हरम जैसे संगठनों के लिए जन्नत बना हुआ है। सरकार उन्हें कंट्रोल नहीं कर पा रही थी और जनता परेशान थी। इन्हीं सब वजहों से सेना ने तख्ता पलट किया और देश की कमान अपने हाथ में ले ली।
नाइजर में हो रही उठापटक के पीछ अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी है। यूरोपियन यूनियन और अमेरिका, दोनों ही राष्ट्रपति मोहम्मद बजौम के समर्थन में हैं और सभी संभव मदद का भरोसा दिलाया है। वहीं सेना को रूस का समर्थन है। अब देश में सैन्य शासन है और विश्व की तमाम शक्तियां किसी ना किसी गुट को समर्थन देने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन फिलहाल किसी भी दखल देने का मौका नहीं मिल रहा है क्योंकि सेना ने देश की सीमाएं भी सील कर रखी हैं और किसी को भी दखल ना देने की चेतावनी दी है।
नाइजर पर दुनिया भर के देशों की नजर लगी है। इसकी वजह ये है कि यहां यूरेनियम का बहुत बड़ा भंडार है। यूरेनियम उत्पादन के मामले में ये देश सातवें नंबर पर है। यहां से अमेरिका, फ्रांस और यूरोपियन यूनियन को यूरेनियम भेजा जाता है। इस यूूरेनियम पर दुनिया भर के देशों की निगाहें गड़ी है। अगर इन देशों को यूरेनियम सप्लाई रुक जाए, तो उनके परमाणु कार्यक्रम से लेकर बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ेगा। ऐसे में सभी यहां अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।
आने वाले दिनों में नाइजर भी अंतरराष्ट्रीय गुटों के लिए युद्ध का मैदान बन जाए, तो ये कोई बड़ी बात नहीं होगी।अफ्रीकी मामलों के जानकार मानते हैं अफ्रीकी देशों में चल रही सिर्फ 30% लड़ाई ही आपसी है, जबकि बाकी 70% इंटरनेशनल साजिश है, जो अपने फायदे के लिए अफ्रीका को युद्ध का मैदान बनाये रखना चाहते हैं। दरअसल पूरा अफ्रीका ही वैश्विक शक्तियों के लिए युद्ध का मैदान है। सभी यहां के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना चाहते हैं और उसके लिए पैसे या हथियारों की सप्लाई करने को कोई मौका नहीं चूकते।