बीजिंग। जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर का नाम वैश्विक आतंकी की सूची में शामिल कराने के भारत के प्रयास पर एक बार फिर चीन ने अडंगा लगा दिया है। प्रतिबंधित समूह के सरगना पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने पेश किया था। पिछले 10 वर्षों में यूएन में यह चौथा मौका है, जब चीन ने पाकिस्तान के साथ दोस्ती निभाते हुए मसूद को बचा लिया है। दोस्ती के अलावा चीन की मजबूरी भी हैं कि वह पाकिस्तान और आतंकियों का साथ दे।

दरअसल, चीन अपने दोस्त पाकिस्तान को हर बार बचाकर भारत पर दबाव बनाए रखना चाहता है और भारत को पाकिस्तान के साथ उलझाए रखना चाहता है। इस तरह वह न सिर्फ भारत की विकास की गति को रोकता है, बल्कि अपने देश के विकास को तेजी से आगे बढ़ाता है। इसके साथ ही वह एशियाई देशों में भारत के दबदबे को भी नियंत्रित करने का यह तरीका मानता है।

दूसरा कारण यह है कि चीन 1267 कमेटी में अपने अधिकार और वैद्यता को बनाए रखना चाहता है। यह दिखाता है कि चीन की मर्जी के बिना दक्षिण एशिया में पत्ता भी नहीं हिल सकता है।

तीसरा, चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के बुनियादी ढांचे पर चीन ने काफी निवेश किया है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और जैश जैसे आतंकी संगठनों को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मुहैया कराने के बदले में उसे अपने प्रोजेक्ट में आतंकवादी हमले नहीं होने की गारंटी मिलती है।

बताते चलें कि चीन की कई कंपनियों ने 45 CPEC प्रोजेक्ट्स में करीब 40 अरब डॉलर का निवेश किया है। इनमें से करीब आधी परियोजनाएं पूरी होने वाली हैं। चीन इस प्रोजेक्ट के जरिये दुनियाभर के बाजारों में अपना कब्जा और दबदबा बनाना चाहता है।

चौथा कारण यह है कि चीन पूर्वी शिनजियांग प्रांत में मुस्लिम उइगर अल्पसंख्यकों के साथ खराब बर्ताव करता है। उनके दमन के लिए चीन ने कई तरह के शिविर बना रखें हैं। मगर, पाकिस्तान इस मसले पर कुछ नहीं कहता है और उल्टा चीन का ही साथ देता है।

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