
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इन दिनों Flydubai की फ्लाइट के 180 यात्रियों को बचाने वाले भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर की दुनियाभर में तारीफ हो रही है। वहीं इस मामले में आरोपी ओमानी मूल के को-पायलट हमाम अल-हमामी पर ओमान सरकार को खुद सफाई देनी पड़ी है।
सरकार ने कहा है कि हमामी ने अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा देश के बाहर बिताया है और विदेशों में पढ़ाई की है। ओमान सरकार के मुताबिक कट्टरपंथ से जुड़ी वेबसाइट एक्सेस करने के सबूत मिलने के बाद उसे एविएशन सेक्टर में काम करने से रोक दिया गया था, जिसके बाद वह ओमान छोड़कर चला गया था।
इस बड़ी घटना के बाद ओमान और भारत दोनों देश सुर्खियों में हैं। ऐसे में भारत और ओमान के गहरे रिश्तों से जुड़ी एक सच्ची और 32 साल पुरानी कहानी एक बार फिर चर्चा में है, जब ओमान के इतिहास में सुल्तान ने सारे प्रोटोकॉल तोड़कर भारत के राष्ट्रपति को लेने खुद एयरपोर्ट पहुंच गए थे और खुद कार ड्राइव करके उन्हें पैलेस ले गए थे। वजह जानकर हर कोई इमोशनल हो गया था।
साल था 1994। ओमान के सुल्तान काबूस बिन सैद अल-सैद के 24 साल के शासनकाल में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि वे खुद किसी विदेशी मेहमान को लेने एयरपोर्ट गए हों। लेकिन जब भारत के राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का विमान ओमान की धरती पर उतरा, तो सुल्तान ने वो कर दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वे सीधे भारतीय विमान की सीढ़ियों पर चढ़ गए, राष्ट्रपति का गर्मजोशी से स्वागत किया और खुद गाड़ी चलाकर उन्हें अपने साथ शाही महल ले गए।
बाद में जब सुल्तान से इस खास स्वागत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब बहुत सीधा और दिल को छूने वाला था। उन्होंने कहा था, "मैंने भारत के पुणे शहर में पढ़ाई की है और डॉ. शंकर दयाल शर्मा वहां मेरे प्रोफेसर थे। अपने गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने का यह मेरा एक छोटा सा तरीका था।" यह सुनकर ओमान ही नहीं, भारत के लोग भी भावुक हो गए थे। यह अनोखा वाकया इतिहास के उस भूले-बिसरे पन्ने को खोलता है जो दिखाता है कि भारत और मिडिल ईस्ट का रिश्ता सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि कितना गहरा और आत्मीय रहा है।
इस कहानी की शुरुआत दशकों पहले हुई थी। सलालाह के युवा राजकुमार काबूस पुणे पहुंचे थे। उनके पिता सुल्तान सैद बिन तैमूर खुद भारत के मशहूर मेयो कॉलेज के छात्र रह चुके थे। इसी पारिवारिक परंपरा को निभाते हुए उन्होंने 1950 के दशक में अपने इकलौते बेटे को पढ़ने के लिए पुणे भेजा। वहां राजकुमार काबूस को पढ़ाने वालों में डॉ. शंकर दयाल शर्मा भी शामिल थे, जो आगे चलकर 1992 से 1997 तक भारत के नौवें राष्ट्रपति बने।
पुणे में बिताए उन दिनों ने राजकुमार के दिल पर कभी न मिटने वाली छाप छोड़ी। एक भारतीय राजनयिक ने बाद में बताया था कि सुल्तान के मन में अपने छात्र जीवन की बेहद खूबसूरत यादें थीं, और यही वजह थी कि वे भारतीय समुदाय और भारत की हर मदद के लिए हमेशा दिल खोलकर खड़े रहे। साल 1970 में ओमान की कमान संभालने के बाद सुल्तान काबूस ने अपने देश की तकदीर बदल दी। लेकिन अपने 50 साल के ऐतिहासिक शासनकाल में वे भारत से जुड़े अपने इस खास रिश्ते को कभी नहीं भूले।