
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पृथ्वी के दोनों ध्रुव वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के कारण अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं। हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका 'साइंटिफिक डेटा' में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन ने दुनिया भर के पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 1979 के बाद से ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के ग्लेशियरों से लगभग 12.5 ट्रिलियन टन बर्फ पिघल चुकी है। यदि बर्फ के इस विशाल भंडार की तुलना की जाए, तो यह पूरे अमेरिकी महाद्वीप को लगभग 5 फीट गहरे बर्फ के आवरण से ढकने के लिए पर्याप्त है।
हिमनदों के पिघलने से उत्पन्न पानी का परिमाण लगभग 11.3 क्वाड्रिलियन लीटर (3 क्वाड्रिलियन गैलन) दर्ज किया गया है। जल के इस अत्यधिक प्रवाह के कारण 1979 से लेकर वर्तमान तक वैश्विक महासागरों के जलस्तर में लगभग 3.1 सेंटीमीटर (1 इंच) की बढ़ोतरी हुई है।
अध्ययन की मुख्य शोधकर्ता और नॉर्थम्ब्रिया विश्वविद्यालय की ग्लेशियोलॉजिस्ट इनेस ओतोसाका के अनुसार, 1 इंच की यह वृद्धि सतही तौर पर मामूली प्रतीत हो सकती है, किंतु इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हैं। समुद्र का स्तर हर एक-तिहाई इंच बढ़ने से दुनिया भर के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले 20 से 30 लाख लोगों के सामने प्रतिवर्ष कम से कम एक बार विनाशकारी बाढ़ का सामना करने का सीधा जोखिम उत्पन्न हो जाता है।
वैज्ञानिक अध्ययन में यह नया तथ्य सामने आया है कि हिमनदों के विखंडन के लिए केवल वायुमंडलीय तापमान जिम्मेदार नहीं है।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और नासा (NASA) के उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 1970, 1980 और 1990 के दशकों में ध्रुवीय बर्फ की स्थिति काफी हद तक स्थिर थी। हालांकि, 2010 के बाद से इसमें तीव्र गिरावट दर्ज की गई।
2020-2023 का सामयिक ठहराव: उपग्रह चित्रों से पता चलता है कि 2020 से 2023 के दौरान अल्पकालिक मौसमी बदलावों के कारण बर्फ पिघलने की गति में थोड़ी नरमी आई थी। पूर्वी अंटार्कटिका में हुई भारी बर्फबारी ने पश्चिमी हिस्से में हुए नुकसान को कुछ समय के लिए संतुलित किया था।
पुनः तीव्र गति: 2023 के बाद से हिमनदों के तेजी से विलीन होने का सिलसिला पुनः शुरू हो चुका है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के विज्ञानी एरिक रिग्नोट और न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के बर्फ विशेषज्ञ डेविड हॉलैंड ने सचेत किया है कि हिमनदों में हो रहा यह नुकसान 'डायनेमिक' (अत्यंत तीव्र गति से होने वाला) है। यह प्रक्रिया किसी भी समय ग्लेशियरों के अचानक ध्वस्त होने जैसी विनाशकारी स्थिति पैदा कर सकती है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि आज वैश्विक तापमान में वृद्धि को पूरी तरह रोक भी दिया जाए, तब भी अतीत में उत्सर्जित ऊष्मा के कारण हिमनदों का पिघलना आने वाले कई दशकों तक जारी रहेगा।
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