
बिजनेस डेस्क। पिछले 25 सालों में निफ्टी की गिरावट सितंबर में सबसे ज्यादा रही है। सितंबर 2001 में निफ्टी 6.5 प्रतिशत गिरा था और अब करीब 6.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की।
निफ्टी में 1,400 से ज्यादा अंकों की गिरावट के साथ अपने 200-वीक मूविंग एवरेज से 22,600 के स्तर से नीचे चला गया। मंगलवार को इंडेक्स ने 22,569 का इंट्राडे निचला स्तर छुआ।
15 साल के बाद निफ्टी अपनी सबसे बड़ी गिरावट पर खड़ा है. आखिरी बार साल 2011 में निफ्टी में 24.6 फीसदी की गिरावट देखने को मिली थी और साल 2026 में अब तक 13% से ज्यादा गिर चुका है।
आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक 13 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है। निफ्टी को सबसे ज्यादा नुकसान कैलेंडर ईयर की पहली तिमाही में हुआ था। जनवरी से मार्च तक निफ्टी में 15 फीसदी की गिरावट देखने को मिली थी। उसके बाद दूसरी तिमाही यानी अप्रैल से जून तक में निफ्टी में 7 फीसदी से ज्यादा की रिकवरी देखी गई। लेकिन ये रिकवरी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई और जुलाई से सितंबर के बीच निफ्टी में 5 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ गई। सितंबर महीने में निफ्टी 5 फीसदी टूट चुका है।
निफ्टी में गिरावट के क्या हैं कारण?
ब्रेंट क्रूड करीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने के बाद लगभग 105 डॉलर के आसपास बना रहा जिसका असर निफ्टी पर भी पड़ा। भारत की बड़ी तेल आयात जरूरतों के कारण महंगा कच्चा तेल आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव बनाता है।
सितंबर में रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 96.2 के स्तर तक कमजोर हुआ। भारत की 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड 7.17 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5 प्रतिशत से ऊपर रही।
बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी निफ्टी के दबाव का बड़ा कारण है। सितंबर में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से 2.17 अरब डॉलर से ज्यादा की निकासी की। महंगा तेल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी ने विदेशी निवेशकों को प्रभावित किया।