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बिजनेस डेस्क। वेनेजुएला (Venezuela Crisis) पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा दिया है, जिसका सीधा असर वहां सक्रिय 10 भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है। भारत और वेनेजुएला के बीच मुख्य कारोबारी संबंध ऊर्जा क्षेत्र में हैं। यदि इस संकट के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो भारतीय तेल कंपनियों के लिए नए अवसर खुल सकते हैं, अन्यथा मौजूदा निवेश और सप्लाई चेन पर बड़ा जोखिम मंडरा रहा है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज: वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल की बड़ी खरीदार रही है। सप्लाई बहाल होने पर इसके रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार की उम्मीद है।
ONGC Videsh: दो तेल परियोजनाओं में सीधी हिस्सेदारी है। प्रतिबंध हटने से बकाया राशि की वसूली और उत्पादन बढ़ने की संभावना है।
IOC व ऑयल इंडिया: कैराबोबो प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी के कारण इन पर उत्पादन रुकने का खतरा है, लेकिन भविष्य में लाभ संभव है।
MRPL: कच्चे तेल के सोर्सिंग विकल्पों में बदलाव से इसकी रिफाइनिंग इकोनॉमिक्स प्रभावित हो सकती है।
सन फार्मा व ग्लेनमार्क: दोनों की स्थानीय सहायक कंपनियां हैं। राजनीतिक अस्थिरता से सप्लाई चेन और मार्केट एक्सेस बाधित हो सकता है।
सिप्ला: दवा निर्यात पर आर्थिक और लॉजिस्टिक्स संकट का असर पड़ने की आशंका है।
जिंदल स्टील एंड पावर: वेनेजुएला के सबसे बड़े लौह अयस्क माइनिंग कॉम्प्लेक्स का संचालन करती है। खनन क्षेत्र में अस्थिरता से भारी नुकसान संभव है।
इंजीनियर्स इंडिया: कराकस में कार्यालय होने के कारण जमीनी असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वेनेजुएला में स्थिरता लौटती है, तो वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे रिलायंस और ONGC जैसे बड़े खिलाड़ी 'लाभार्थी' बन सकते हैं। हालांकि, अल्पकालिक सैन्य संघर्ष जिंदल स्टील और फार्मा कंपनियों के लिए परिचालन संबंधी बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकता है। निवेशकों की नजर अब अमेरिका के अगले कदमों और वेनेजुएला की भावी नीति पर टिकी है।
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