
नईदुनिया प्रतिनिधि, अंबिकापुर। कबाड़ के पुश्तैनी धंधे में कुछ वर्दी वालों की हिस्सेदारी और थाने से लेकर घर तक बेरोकटोक आवाजाही ने एक बदमाश का मनोबल इतना बढ़ा दिया था कि उसे न पुलिस का खौफ रहा, न कानून का डर।
वह खुद को बेलगाम समझने लगा था। उसे लगता था कि वह जो चाहे कर सकता है, क्योंकि कई बार उसकी आपराधिक हरकतों पर खुद पुलिस ने ही पर्दा डाल दिया था। थाने में घुसकर अधिकारी का कॉलर पकड़ना, थाने के सामने खड़े होकर गाली-गलौज करना और जान से मारने की धमकी देना उसके लिए रोज की बात थी।
मनोबल का आलम यह था कि जिला बदर होने के बावजूद वह तत्कालीन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की मौजूदगी वाले मंच पर दुर्गा पूजा समिति के पदाधिकारी के तौर पर पुरस्कार लेने पहुंच गया और किसी ने उसे टोका तक नहीं। इसी बढ़े हुए मनोबल ने आखिरकार सूरजपुर को दहला देने वाली वारदात को जन्म दिया।
हम बात कर रहे हैं सूरजपुर के बहुचर्चित प्रधान आरक्षक की पत्नी और मासूम बेटी की हत्या के मामले की, जिसमें अदालत ने मुख्य आरोपित कुलदीप साहू, उसके साथी एनएसयूआई के तत्कालीन जिलाध्यक्ष चंद्रकांत उर्फ सीके चौधरी और फूल सिंह उर्फ रिंकू को फांसी की सजा सुनाई है, जबकि चौथे साथी आर्यन उर्फ गोल्डी विश्वकर्मा को उम्रकैद की सजा दी गई है।
कहानी की पृष्ठभूमि में सूरजपुर पुलिस की कार्यशैली भी सवालों में रही। वर्ष 2024 में दुर्गा पूजा के दौरान जिला बदर होने के बावजूद कुलदीप शहर लौट आया। मोहल्ले की पूजा समिति का पदाधिकारी बनकर खुलेआम घूमता रहा। आठ अक्टूबर 2024 को थाना के सामने शहनाज अख्तर के जागरण कार्यक्रम में दो पक्षों में झगड़ा हुआ।
एक पक्ष में कुलदीप का भाई संदीप भी था। पुलिस ने उसे पकड़कर थाने में सबक सिखाया। इस बात से कुलदीप बौखला गया। उसने थाने के सामने ही पुलिसकर्मियों को गालियां दीं और कथित रूप से भाई को पकड़ने वाले प्रधान आरक्षक से रंजिश पाल ली।
13 अक्टूबर की शाम पुलिस को सूचना मिली कि कुलदीप बस स्टैंड में है। घेराबंदी हुई तो उसने अपने साथियों के साथ पुलिसकर्मियों पर गर्म तेल उड़ेल दिया। दो जवान झुलस गए। वहां से भागते हुए उसने चार पहिया वाहन से पुलिसकर्मियों को कुचलने की कोशिश की। नाकाम होने पर वह सीधे प्रधान आरक्षक के किराए के मकान पर पहुंचा।
दरवाजा खुलवाया और अंदर घुसते ही दरिंदगी की सारी हदें पार कर दीं। प्रधान आरक्षक की पत्नी और 12 साल की मासूम बेटी को चाकू और कैंची से गोद-गोद कर मार डाला। वारदात के दौरान घायल अवस्था में ही महिला से तीन आरोपितों ने दुष्कर्म किया। हत्या के बाद दोनों शवों को घर से दूर ले जाकर फेंक दिया। 14 अक्टूबर की सुबह जब शव मिले तो पूरे सूरजपुर में आक्रोश फूट पड़ा। शहर बंद हो गया। लोगों का गुस्सा सड़कों पर था।
घटना के बाद हालात बिगड़ते देख सरकार ने तत्कालीन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को हटा दिया। प्रशांत सिंह ठाकुर को सूरजपुर की कमान सौंपी गई। उनके सामने दोहरी चुनौती थी। एक ओर पुलिसकर्मियों का गिरा मनोबल बढ़ाना, दूसरी ओर ऐसी मजबूत कड़ी जोड़ना कि दरिंदे फांसी के फंदे तक पहुंचें। शासन ने मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने का आदेश दिया और विशेष लोक अभियोजक के रूप में सुरेश चंद्र शर्मा को नियुक्त किया। पुलिस ने अलग-अलग जगहों से छह आरोपितों को पकड़ा।
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सूरजपुर अपर सत्र न्यायाधीश फ़ास्ट ट्रैक आनंद प्रकाश वारियाल की अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि प्रतिशोध और अहंकार को संतुष्ट करने के लिए कुलदीप ने असहाय मां-बेटी पर अमानवीय, बर्बर और जघन्य अपराध किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट को दो-तीन बार देखने के बाद अदालत ने पाया कि दोनों मृतकों को भयावह और क्रूर यातनाएं दी गईं।
चोटें इस बात की गवाह हैं कि आरोपितों ने कितनी बर्बरता की। अदालत ने यह भी कहा कि इसी से जुड़े एक अन्य प्रकरण में सजा सुनाए जाने के बाद भी कुलदीप के चेहरे पर मुस्कान थी, शायद इसलिए कि वह पहले 22 मामलों में बरी हो चुका है और उसे लगता था कि इस बार भी कुछ नहीं होगा।
परिवीक्षा रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने माना कि कुलदीप, फूल सिंह और चंद्रकांत के सुधरने की कोई संभावना नहीं है। वहीं चौथे दोषी आर्यन की उम्र 20 साल, घटना स्थल पर मौजूद न होना और कोई आपराधिक इतिहास न होने के कारण अदालत ने उसके सुधार की संभावना मानी और उसे उम्रकैद दी।
दो अन्य को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त किया गया। अदालत ने कहा कि यह मामला रेयरेस्ट ऑफ रेयर की श्रेणी में आता है और मृत्युदंड के अलावा कोई विकल्प नहीं है। फैसले के बाद सूरजपुर थाने के सामने लोगों ने आतिशबाजी की, पुलिस परिवारों ने घर के सामने दीपक जलाए और कहा आखिर न्याय हुआ।