
नईदुनिया प्रतिनिधि, अंबिकापुर: प्रतापपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत बरबसपुर में बुधवार को माध्यमिक शाला भवन के ऊपर एक ड्रोन कैमरा उड़ता हुआ दिखाई दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ड्रोन कुछ देर तक स्कूल परिसर के ऊपर मंडराता रहा।
इसके बाद उसने स्कूल परिसर में स्थित आंगनबाड़ी भवन के अंदर जाने का भी प्रयास किया। ग्रामीणों ने बताया कि कुछ देर बाद ड्रोन मरकाडांड़ की ओर चला गया। क्षेत्र में पहले भी निजी विमानों के लगातार उड़ने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
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अब स्कूल परिसर के ऊपर ड्रोन कैमरा दिखाई देने से ग्रामीणों और स्कूल से जुड़े लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ड्रोन किसका था और उसे स्कूल व आंगनबाड़ी परिसर के ऊपर उड़ाने का उद्देश्य क्या था, इसकी जानकारी सामने नहीं आ सकी है। स्कूल परिसर जैसे संवेदनशील स्थान पर ड्रोन की मौजूदगी जांच का विषय है।
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महीनों से मानदेय अटका, स्कूलों की रसोई पर संकट, उधारी में चल रहा बच्चों का भोजन, रसोइया सहायिकाओं को जून के 15 दिनों का मानदेय भी नहीं मिला
सूरजपुर : सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में बच्चों को गर्म भोजन उपलब्ध कराने वाली मध्याह्न भोजन व्यवस्था इन दिनों आर्थिक संकट से जूझ रही है। रसोइया सहायिकाओं का महीनों से मानदेय लंबित है, वहीं भोजन का संचालन करने वाले महिला स्व-सहायता समूह किराना और सब्जी दुकानदारों से उधारी लेकर व्यवस्था संभाल रहे हैं। भुगतान में लगातार देरी से अब स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि समूहों के हाथ खड़े होने पर स्कूलों की रसोई कभी भी ठंडी पड़ सकती है।
विद्यालयों में रसोइया सहायिकाएं सुबह करीब 10 बजे से दोपहर दो बजे तक भोजन बनाने और बच्चों को परोसने का काम करती हैं। तय समय तक स्कूल में मौजूद रहने के कारण वे इस अवधि में दूसरा रोजगार भी नहीं कर पातीं। इसके बावजूद सितंबर माह बीतने के बाद भी कई सहायिकाओं को मानदेय नहीं मिला है। उनका कहना है कि भुगतान में अक्सर कई माह की देरी होती है। चार माह या उससे अधिक समय बाद राशि जारी होने पर भी एक-दो माह का भुगतान होता है और शेष बकाया फिर लंबित रह जाता है।\
रसोइया सहायिकाओं की एक और बड़ी शिकायत यह है कि स्कूलों के नियमित रूप से खुलने के बाद 16 जून से वे बच्चों के लिए भोजन तैयार करने लगती हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों से जून के शुरुआती 15 दिनों का मानदेय ही नहीं दिया जा रहा है। यानी काम शुरू होने के साथ ही उनकी मेहनत का एक हिस्सा भुगतान की प्रक्रिया में गायब हो जाता है।
उधारी की सीमा भी अब खत्म होने लगी
,मध्याह्न भोजन संचालित करने वाले स्व-सहायता समूहों की स्थिति भी चिंताजनक है। राशन, किराना और सब्जियों की खरीदी के लिए स्थानीय दुकानदारों से उधारी लेकर किसी तरह भोजन व्यवस्था जारी रखी जा रही है। लंबे समय से भुगतान नहीं होने के कारण दुकानदार अब नियमित रूप से तगादा कर रहे हैं। समूह संचालकों का कहना है कि लगातार उधारी में भोजन संचालित करना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।
त्योहारों पर भी आर्थिक तंगी
न्यूनतम मानदेय पर काम करने वाली सहायिकाओं के सामने महीनों तक भुगतान नहीं होने से घरेलू खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। रक्षाबंधन जैसे त्योहार भी कई परिवारों के लिए आर्थिक तंगी के बीच गुजरे। अब दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहार सामने हैं। ऐसे में लंबित मानदेय नहीं मिला तो परिवारों की मुश्किल और बढ़ने की आशंका है।
आवंटन की कमी या भुगतान प्रक्रिया में देरी?
सहायिकाओं और समूह संचालकों के अनुसार, भुगतान को लेकर जानकारी लेने पर कई बार ऊपर से आवंटन नहीं आने की बात कही जाती है। दूसरी ओर विभागीय स्तर पर यह कहा जा रहा है कि बजट और आवंटन की समस्या नहीं है तथा भुगतान प्रक्रिया के स्तर पर देरी की स्थिति है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि राशि उपलब्ध होने के बावजूद लाभार्थियों तक भुगतान पहुंचने में आखिर देरी क्यों हो रही है। समूह संचालकों और रसोइया सहायिकाओं ने लंबित मानदेय तथा संचालन से संबंधित बकाया राशि शीघ्र जारी करने की मांग की है।