
नईदुनिया प्रतिनिधि, अंबिकापुर। मांदर की थाप पर गीत, नृत्य के साथ उल्लास का माहौल यह बताने के लिए काफी है कि समय बदल गया है। यह बदलाव सिर्फ बुनियादी सुविधाओं का नहीं बल्कि उस शांति और विकास का है जिससे जीवन में खुशियां आ गई है। हम बात कर रहे हैं झारखंड की सीमा से लगे छत्तीसगढ़ के दूरस्थ पीपरढाबा, चरहू, बन्दरचुआ ,चुनचुना और पुंदाग गांव की जो कभी माओवादियों के प्रभाव में विकास से पीछे रह गए थे।
छत्तीसगढ़ में माओवाद उन्मूलन की शुरुआत उत्तर छत्तीसगढ़ से ही हुई थी। राज्य गठन के साथ तेजी से पांव पसारे माओवादियों ने इस क्षेत्र को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया था। लूट, हत्या, आगजनी, अपहरण जैसी घटनाओं से लोग सहमे रहते थे। प्रशासन से जुड़े लोगों के नजदीक आने की उनकी हिम्मत नहीं थी। सुरक्षा बलों की दृढ़ इच्छाशक्ति से यह क्षेत्र माओवादियों के प्रभाव से ऐसे मुक्त हुआ कि यहां अब सीआरपीएफ की जरूरत भी नहीं रही।
सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज ने पिछले दिनों पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ इस क्षेत्र का भ्रमण किया तो आसपास के आधा दर्जन से अधिक गांवों के लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। यह किसी उत्सव से कम नहीं था। गीत, नृत्य, सामूहिक भोज तथा सुख-दुख की बातों को एक दूसरे से साझा किया गया। इस क्षेत्र में अब शांति के साथ विकास को गति दी जा रही है।
आंगनबाड़ी, स्कूलों में फिर से बच्चों की चहल-पहल लौट आई है। शिक्षकों की नियमित उपस्थिति और शासकीय योजनाओं के चलते शिक्षा का स्तर बेहतर हुआ है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उप-स्वास्थ्य केंद्रों का लाभ भी मिलने लगा है। अब ग्रामीणों को छोटी-बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए दूर शहरों की ओर नहीं भागना पड़ता।
केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ अब सीधे ग्रामीणों तक पहुंच रहा है। आवास, राशन, पेंशन, रोजगार और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन से लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है। प्रशासनिक पहुंच मजबूत होने से योजनाओं की निगरानी और क्रियान्वयन पारदर्शी तरीके से हो रहा है।
माओवाद के साए से बाहर निकलते ही इन गांवों में विकास की तस्वीर तेजी से बदली है। अब पक्की सड़कों के माध्यम से गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से जुड़ गया है, जिससे आवागमन आसान हुआ है और ग्रामीणों को बाजार, स्कूल व अस्पताल तक पहुंचने में सहूलियत मिली है। कई वर्षों बाद गांवों में नियमित यातायात शुरू हुआ है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को भी बल मिला है।
हर घर तक नल से जल पहुंचाने की दिशा में ठोस काम हुआ है। पेयजल संकट अब अतीत की बात हो चला है। वहीं बिजली व्यवस्था सुदृढ़ होने से रातों का अंधेरा दूर हुआ है। गांवों में रोशनी आने से बच्चों की पढ़ाई, घरेलू कार्य और छोटे-मोटे व्यवसायों को नया सहारा मिला है।
सबसे बड़ा बदलाव भय के वातावरण का समाप्त होना है। अब ग्रामीण बेखौफ होकर अपने भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं। खेत-खलिहानों में फिर से रौनक है और युवा रोजगार व शिक्षा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। कभी माओवाद की पहचान रहे ये गांव आज शांति, विकास और भरोसे के प्रतीक बनते जा रहे हैं।उत्तर छत्तीसगढ़ के ये दूरस्थ गांव अब यह संदेश दे रहे हैं कि जब शांति स्थापित होती है और शासन-प्रशासन जनहित में कार्य करता है, तो बदलाव सिर्फ दिखता ही नहीं, बल्कि महसूस भी होता