सरगुजा में 29 साल से झोपड़ी में चल रहा सरकारी स्कूल, 17 बच्चे घास-फूस के छप्पर में पढ़ने को मजबूर
सरगुजा के नरकट गांव में शासकीय प्राथमिक स्कूल 29 वर्षों से झोपड़ी में संचालित है। 17 बच्चे बदहाल सुविधाओं के बीच पढ़ रहे हैं। भवन स्वीकृति के बाद निर्...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 07 Oct 2026 02:43:43 PM (IST)Updated Date: Wed, 07 Oct 2026 02:43:43 PM (IST)
सरगुजा में 29 साल से झोपड़ी में चल रहा सरकारी स्कूल। (नईदुनिया)HighLights
- सरगुजा में 26 सरकारी स्कूल अब भी भवनविहीन हैं।
- नरकट प्राथमिक स्कूल 1997 से झोपड़ी में संचालित हो रहा।
- स्कूल में 17 बच्चे और दो शिक्षक पदस्थ हैं।
नईदुनिया प्रतिनिधि, अंबिकापुर: सरगुजा जिले में 2390 शासकीय स्कूल संचालित हैं, इनमें से 26 स्कूल आज भी भवन विहीन हैं। इनमें सबसे बदहाल तस्वीर मैनपाट विकासखंड के ग्राम पंचायत करमहा के आश्रित ग्राम नरकट की है, जहां 1997 से यानी 29 साल से शासकीय प्राथमिक शाला घास-फूस की झोपड़ी में चल रही है। यहां 17 बच्चे समस्याओं के बीच पढ़ाई कर रहे हैं। प्लास्टिक और ग्रीन नेट से घास फूंस की झोपड़ी को सहारा दिया गया है ताकि पहाड़ी क्षेत्र में चलने वाली तेज हवाओं के झोंके से बच्चों की तबीयत न बिगड़े।
हर साल होती है झोपड़ी की मरम्मत
- नरकट बस्ती चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां पक्की सड़क आज तक नहीं पहुंची है। आंगनबाड़ी भवन का निर्माण शुरू हुआ था लेकिन वह भी अधूरा है लेकिन प्राथमिक पाठशाला को तो आज तक भवन उपलब्ध नहीं हो सका।आसपास के मजरा-टोलों के बच्चे इसी झोपड़ीनुमा स्कूल में पढ़ने आते हैं। यहां न पक्की छत है, न कमरा, न मध्यान्ह भोजन के लिए रसोई, न खेलने के लिए मैदान।
स्कूल में दो शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं। प्रधानपाठक जोहन तिर्की ने बताया कि बरसात में सबसे ज्यादा परेशानी होती है। तेज बारिश में छत से पानी टपकने लगता है, चारों तरफ से पानी आने से पूरा कमरा गीला हो जाता है। बच्चों के बैठने की दरी भीग जाती है, किताब-कापी और स्कूल का सामान बचाना मुश्किल हो जाता है। कई दिन तो स्कूल लग ही नहीं पाता।
उन्होंने बताया कि 1997 में स्कूल शुरू होने के बाद से आज तक पक्का भवन नहीं मिला। पहले कच्चे घर, फिर अंधेरे कमरे और अब नरकट-प्लास्टिक की झोपड़ी में कक्षाएं चल रही हैं। हर साल बरसात से पहले प्लास्टिक खरीदकर, बल्ली- मजदूर लगाकर झोपड़ी की मरम्मत करनी पड़ती है, तब जाकर स्कूल शुरू हो पाता है। ब्लैक बोर्ड के लिए भी नहीं है जगह
जगह की कमी का सीधा असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। झोपड़ी में ब्लैक बोर्ड लगाने तक की जगह नहीं है। सामान रखने की जगह नहीं। गर्मी में पंखा तक नहीं लगा सकते। मध्यान्ह भोजन पास के घर में बनता है और फिर यहां लाकर बच्चों को खिलाया जाता है।इस स्कूल में 17 बच्चे दर्ज हैं, जिनमें अधिकांश मझवार, कोरवा और उरांव आदिवासी समाज के हैं। इनकी शिक्षा के लिए यह झोपड़ी ही एकमात्र सहारा है।
कई बार दी जानकारी लेकिन भवन नहीं बन सका
भवनविहीन स्कूलों की जानकारी हर बार अधिकारियों को भेजी जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि अधिकारियों द्वारा जानकारी दी जाती है कि भवन स्वीकृत हो चुका है और बरसात के बाद काम शुरू होगा, लेकिन 29 साल बीतने के बाद भी फाइल आगे नहीं बढ़ी। अभिभावकों का कहना है कि हमें बड़ी सुविधा नहीं चाहिए, बस बच्चों के लिए एक सुरक्षित पक्का भवन चाहिए। ताकि हमारे बच्चे अच्छे माहौल में पढ़ाई कर सकें।
स्कूल भवन की मिली स्वीकृति
लोक शिक्षण संचालनालय के बजट में स्कूल भवन की स्वीकृति है। हम स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध मद से स्कूल भवन का काम शुरू कराएंगे। जिले में कुल 26 स्कूल भवन विहीन है। कलेक्टर के मार्गदर्शन में कार्ययोजना बन चुकी है।पूरा प्रयास है कि इस सत्र में सभी स्कूलों को अपना भवन बन जाएं। डॉ दिनेश कुमार झा, जिला शिक्षा अधिकारी सरगुजा
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