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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 03, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Chhattisgarh में भी है एक राष्ट्रपति भवन, जानिए क्या है इसका इतिहास, देखें VIDEO

Rashtrapati Bhavan in Chhattisgarh बताया जाता है कि जब डॉ राजेन्द्र प्रसाद आजादी की लडाई के दौरान क्रांतिकारी की भूमिका में काम कर रहे थे

By Sandeep ChoureyEdited By: Sandeep Chourey
Publish Date: Fri, 03 Jul 2020 10:55:29 AM (IST)Updated Date: Fri, 03 Jul 2020 05:13:59 PM (IST)
Chhattisgarh में भी है एक राष्ट्रपति भवन, जानिए क्या है इसका इतिहास, देखें VIDEO

हिमांशु शर्मा, अंबिकापुर Rashtrapati Bhavan in Chhattisgarh। छत्तीसगढ एक ऐसा राज्य है जो अपने अंदर कई तरह की विशिष्टताओं को समेटे हुए है। यहां की आदिवासी जनजातियां, उनकी सभ्यता और संस्कृति हमेशा से ही दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। इन्हीं में से एक है पंडो जनजाति। सरगुजा की इस मूल जनजाति को विशेष संरक्षित जनजाति का दर्जा प्राप्त है और इसके साथ ही इन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहा जाता है। दरअसल भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद का इनसे एक खास रिश्ता रहा है। बताया जाता है कि जब डॉ राजेन्द्र प्रसाद आजादी की लडाई के दौरान क्रांतिकारी की भूमिका में काम कर रहे थे, उस दौरान अंग्रेज पुलिस उन्हें तलाश रही थी और वे उनसे बचने के लिए सरगुजा के इस इलाके में पंडो आदिवासियों के गांव में आकर छिपे थे। वे यहां करीब दो साल रहे और इस दौरान एक शिक्षक के रूप में वे यहां कार्य करते रहे।

आजादी के बाद डॉ. प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। इसी बीच साल 1952 में उनका छत्तीसगढ़ आगमन हुआ। छत्तीसगढ आने पर उन्होंने सरगुजा में उन्हीं आदिवासियों के बीच जाकर कुछ समय रहने की इच्छा जाहिर की। वे पुरानी यादों को संजोना चाहते थे। 22 नवंबर 1952 को वे सरगुजा महाराजा रामानुजशरण सिंहदेव के साथ पंडोनगर पहुंचे। यहां राष्ट्रपति के प्रवास के लिए यह भवन तैयार किया गया था। इसी भवन में डॉ राजेन्द्र प्रसाद रहे और पंडो व कोरवा जनजाति के आदिवासियों को अपना दत्तक पुत्र घोषित किया।


हालांकि यह बात करीब 68 साल पुरानी हो गई है, लेकिन इस राष्ट्रपति भवन की गरिमा आज भी बरकरार है। पंडो समुदाय के उस वक्त के जिन लाेगों ने राष्ट्रपति का आगमन, प्रवास देखा, उनका स्वागत-सत्कार किया और सानिध्य हासिल किया, उनमें से कोई भी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उस पल की सुनहरी यादें पीढी दर पीढी इस भवन के माध्यम में उनके समक्ष जीवित हैं।

पंडो आदिवासी इसे गर्व की बात मानते हैं कि उनके गांव में देश के राष्ट्रपति का अधिकारिक निवास है। इस भवन को देश के राष्ट्रपति का अधिकारिक निवास घोषित किया गया है और इसका संधारण और साज- सज्जा गरिमा के अनुरूप हमेशा बनी रहती है।

पंडोनगर ग्राम पंचायत के सरपंच आगर साय पंडो बताते हैं कि जिस वक्त राष्ट्रपति यहां आए थे, उस वक्त वे पैदा भी नहीं हुए थे। उनके दादा ने राष्ट्रपति का सानिध्य हासिल किया था और उन्होंने ही पुरानी बातें उन्हें बताई थीं। 830 घरों वाले इस गांव में अब कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं बचा जो उस दौर में मौजूद रहा हो।

आगर साय कहते हैं कि यहां बसे पंडो आदिवासियों का जीवन सादगी और शांति के साथ चल रहा है। बच्चे अब पढ लिख कर तरक्की कर रहे हैं, लेकिन उनकी सबसे बडी समस्या यह है कि उनके पूर्वजों की जमीन पर आज भी उन्हें मालिकाना हक नहीं मिल पाया है। गांव में सिर्फ 25 फीसद लोगों को ही भूमि पट्टा मिल पाया है।

सादगीपूर्ण जीवन जीते थे डॉ राजेन्द्र प्रसाद

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मूल रूप से बिहार के रहने वाले थे और स्वतंत्रता संगाम में कूदने से पहले वे एक जाने-माने वकील थे। देश के एकमात्र पूर्व राष्ट्रपति है जिन्होंने लगातार दो कार्यकाल पूरे किए। उनका जीवन सादगी का प्रतीक था। उन्हें मिलने वाले वेतन का आधा से अधिक हिस्सा वे राष्ट्रीय कोष में दान कर देते थे। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने सरकारी काम-काज की प्रणाली में अंग्रेजी व्यवस्था का विरोध किया।