
नईदुनिया न्यूज, बीजापुर। नए बस स्टैंड के पीछे बसे अस्थायी मोहल्ले में दो दिनों तक चले प्रशासन के बुलडोजर ने सिर्फ दीवारें और छप्पर नहीं तोड़े, बल्कि उन लोगों के भरोसे और भविष्य को भी रौंद गया, जो खुद को माओवाद की हिंसा से बचाकर शहर में सुरक्षित जीवन की तलाश में आए थे।
जिला प्रशासन ने अवैध अतिक्रमण हटाने के नाम पर करीब 120 मकानों को ध्वस्त कर दिया। अब इन टूटे घरों के बीच यह सवाल खड़ा है कि क्या इनमें रहने वाले वास्तव में माओवाद पीड़ित थे या फिर महज अतिक्रमणकारी।
कार्रवाई के बाद सामने आए दावों के अनुसार, तोड़े गए मकानों में से करीब 20 परिवार खुद को माओवाद पीड़ित बता रहे हैं। इनका कहना है कि वे गांवों में माओवादियों के डर से खेती-बाड़ी छोड़कर शहर आए थे। चिन्नाकवाली गांव की मीना यालम, संतोष और कृष्णा राव बताते हैं कि वे तीन साल पहले यहां आकर बसे थे।
मीना यालम का कहना है कि शांतिनगर में पहले जमीन मिली थी, लेकिन परिवार बढ़ने के बाद रहने की जगह कम पड़ गई। मजबूरी में उन्होंने यहां छोटा मकान बनाया। अब बिना किसी नोटिस के घर तोड़ दिया गया।
ठंड के मौसम में हम सड़क पर आ गए, घर का सारा सामान भी टूट गया। इसी इलाके में कांदुलनार, पेद्दाजोजेर, मोदकपाल सहित दस से अधिक गांवों से आए लोग रह रहे थे।
दावा यह भी है कि पांच मकान जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों के परिवारों के थे, जिनके सदस्य माओवाद विरोधी अभियानों में तैनात हैं। इस पर सियासत भी गरमा गई है।
सीपीआइ नेता कमलेश झाड़ी ने कहा कि एक तरफ सरकार पुनर्वास और मुख्यधारा में लौटाने की बात करती है, दूसरी ओर माओवाद पीड़ितों और जवानों के परिवारों के घर तोड़ दिए जाते हैं। यह बेहद अमानवीय है।
बीजापुर कलेक्टर संबित मिश्रा का कहना है कि जिन परिवारों को वास्तव में माओवाद प्रभावित माना गया, उन्हें पहले ही शांतिनगर में बसाया जा चुका है। जहां कार्रवाई हुई, वहां नया अतिक्रमण था। जांच में किसी भी परिवार के माओवाद पीड़ित होने के प्रमाण नहीं मिले।
कई लोगों के अन्य स्थानों पर भी मकान हैं और कुछ मामलों में जमीन बेचने की जानकारी भी सामने आई है। यदि कोई परिवार वास्तव में माओवाद पीड़ित है और उसे पहले लाभ नहीं मिला है, तो आवेदन करने पर पुनर्वास नीति के तहत संवेदनशील तरीके से मदद दी जाएगी।
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प्रदेश सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित माओवादियों और माओवादी हिंसा से प्रभावित परिवारों को सुरक्षित आवास, आर्थिक सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जोड़ने का प्रविधान है।
पात्र परिवारों को आवासीय कॉलोनियों में प्लॉट या मकान, एकमुश्त अनुदान, बच्चों की पढ़ाई के लिए सहयोग तथा रोजगार प्रशिक्षण दिया जाता है। लाभ के लिए जिला स्तर पर सत्यापन और आवेदन प्रक्रिया अनिवार्य है।
डीआरजी जवानों के लिए पुलिस प्रशासन की ओर से अलग आवास व्यवस्था है, जबकि आत्मसमर्पित माओवादियों के लिए शासन के पुनर्वास केंद्र संचालित हैं।
-विनीत साहू, डीएसपी