बिलासपुर में लिफ्टमैन पिता की अनूठी पाठशाला, फर्श पर गढ़ रहे बेटे का भविष्य
बिलासपुर की पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग में समाज कल्याण विभाग के पास लिफ्ट चलाने वाले दिव्यांग बाहुरन धुरी अपनी ड्यूटी के दौरान अपने पांच वर्षीय बेटे कृष ...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 12 Oct 2026 10:48:37 PM (IST)Updated Date: Mon, 12 Oct 2026 10:48:37 PM (IST)
बाहुरन धुरी अपने पांच वर्षीय बेटे कृष को पढाते हुए।HighLights
- कंपोजिट बिल्डिंग की लिफ्ट के पास चल रही अनूठी पाठशाला।
- दिव्यांग चालक बाहुरन धुरी ड्यूटी के साथ पढ़ा रहे बेटा कृष।
- फर्श पर गत्ता बिछाकर पिता सिखा रहे क-ख-ग और एबीसीडी।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग में लगी लिफ्ट के दरवाजे के पास वात्सल्य और संघर्ष की अनूठी पाठशाला चल रही है। समाज कल्याण विभाग के पास लगी लिफ्ट के दिव्यांग चालक बाहुरन धुरी ड्यूटी के साथ अपने पांच वर्षीय बेटे कृष का भविष्य संवार रहे हैं। लिफ्ट खाली होते ही वे फर्श पर बैठकर बेटे को क-क, ख-ख सिखाने में जुट जाते हैं।
शासकीय भवनों की भागदौड़ के बीच पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग का यह दृश्य हर आने-जाने वाले का हृदय छू लेता है। समाज कल्याण विभाग के पास लगी लिफ्ट के संचालक बाहुरन धुरी स्वयं दिव्यांग हैं, मगर उनका हौसला बुलंद है। उनका पांच वर्षीय बेटा कृष केजी-2 का छात्र है। सीमित संसाधनों और उचित देखरेख के अभाव में बाहुरन उसे अपने साथ ही कम्पोजिट बिल्डिंग कार्यालय ले आते हैं।
दिनभर आगंतुकों को लिफ्ट से ऊपर-नीचे पहुंचाने की व्यस्तता रहती है। जैसे ही लिफ्ट में लोगों की आवाजाही थमती है, बाहुरन तुरंत किनारे फर्श पर गत्ता बिछाकर बैठ जाते हैं। वे अपने नन्हे बेटे की पुस्तक कापी खोलकर पेंसिल पकड़ाते हैं और क-ख-ग-घ व ए, बी, सी, डी सिखाने लगते हैं।
विभिन्न विभागों में काम से आने वाले लोग जब एक दिव्यांग पिता को अभावों के बीच इतनी शिद्दत से बच्चे को पढ़ाते देखते हैं, तो उनका सीना गर्व से भर जाता है। लिफ्ट के पास चल रही यह अनूठी पढ़ाई व्यवस्था एक पिता के संघर्ष की जीती-जागती मिसाल पेश करती है। बाहुरन का यह जज्बा साबित करता है कि गरीबी और शारीरिक अक्षमता कभी संतान के बेहतर भविष्य की राह में रोड़ा नहीं बन सकती।
अफसर नहीं, बस एक अच्छा इंसान बने बेटा
बाहुरन का कहना है कि वे बेटे को कोई बड़ा अफसर, डाक्टर या पुलिस अधिकारी बनाने का ख्वाब नहीं देख रहे। बेटा अभी बहुत छोटा है। उनकी बस इतनी चाहत है कि कृष पढ़-लिखकर एक अच्छा इंसान बन जाए। इसीलिए वे स्कूल छूटने के बाद उसे पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग ले आते हैं और खाली समय में स्वयं पढ़ना सिखाते हैं।
लिफ्ट का बरामदा क्लास
रूम, गत्ता बनी दरी, बस्ता बना संबल लिफ्ट के ठीक बगल का एक कोना कृष की कक्षा बन चुका है। जमीन पर बिछा अखबार व गत्ता उनकी दरी है। पास रखा रंग-बिरंगा स्कूल बैग और पानी की बोतल बताती है कि पिता ड्यूटी के साथ बेटे की शिक्षा को लेकर सजग हैं। फुर्सत मिलते ही दोनों पिता-पुत्र पढ़ाई में पूरी तरह लीन रहते हैं।
आगंतुकों के आकर्षण का केंद्र, हर कोई देख रहा समर्पण
पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग में समाज कल्याण समेत कई सरकारी कार्यालय संचालित होते हैं। यहां रोजाना सैकड़ों की तादाद में नागरिक और अधिकारी आते हैं। लिफ्ट खाली होते ही जमीन पर बैठकर बेटे की कापी जांचते पिता का यह दृश्य सभी को भावुक कर देता है। कई अधिकारी पिता के इस समर्पण और लगन की मुक्तकंठ से सराहना करते हैं।
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