
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में एसी कोच में काम करने वाले कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य भत्ता देने के मामले में हाई कोर्ट ने रेलवे प्रशासन को झटका दिया है। मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगलपीठ ने रेलवे और केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), जबलपुर पीठ के आदेश को बरकरार रखा है। इसके साथ ही दुर्ग और रायपुर मंडल में कार्यरत 14 एसी कोच तकनीशियन और सहायकों को अतिरिक्त कार्य भत्ता मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
मामला डब्ल्यूपीएस क्रमांक 3049/2026, भारत संघ व अन्य बनाम सीएच. डोरा बाबू व अन्य से जुड़ा है। कर्मचारियों ने अतिरिक्त कार्य भत्ते की मांग को लेकर जबलपुर अधिकरण में आवेदन किया था। अधिकरण ने 25 सितंबर 2025 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए भत्ता देने का निर्देश दिया था।
रेलवे ने इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। रेलवे की ओर से उप सॉलिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा ने कहा कि अधिकरण ने रेल मंत्रालय के 27 जून 1985 के परिपत्र में एसी कोच कर्मचारियों के काम के घंटे और अतिरिक्त कार्य भत्ते की गणना के लिए निर्धारित व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
उनका तर्क था कि इस परिपत्र को पहले के मामलों में चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए पुराने फैसलों के आधार पर कर्मचारियों को भत्ता नहीं दिया जा सकता। कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता स्मिता झा ने कहा कि एसी कोच कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य भत्ता दिए जाने का कानूनी सिद्धांत पहले ही तय हो चुका है।
मुंबई पीठ के अधिकरण के फैसले को वहां के हाई कोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती दी गई थी, लेकिन रेलवे को राहत नहीं मिली। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट भी दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बनाम नजीर अहमद मामले में 1985 के परिपत्र की व्याख्या कर चुका है।
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युगलपीठ ने कहा कि एसी कोच कर्मचारियों के अतिरिक्त कार्य भत्ते की पात्रता का प्रश्न पहले ही न्यायिक फैसलों से स्पष्ट हो चुका है। 27 जून 1985 के रेल मंत्रालय के परिपत्र पर भी हाई कोर्ट नजीर अहमद के मामले में विचार कर चुका है। उसमें निर्धारित परिस्थितियों में कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य भत्ते का हकदार माना गया था।
कोर्ट ने पाया कि जबलपुर अधिकरण ने इसी स्थापित कानूनी स्थिति के आधार पर कर्मचारियों के पक्ष में आदेश दिया है। उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। इस आधार पर रेलवे की याचिका खारिज कर दी गई और अधिकरण का आदेश बरकरार रखा गया।