
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन नहीं मिलेगी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 21 से अधिक याचिकाएं खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पंचायत कर्मचारी राज्य के शासकीय सेवक नहीं हैं और उनके लिए पेंशन का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने अदालत को बताया कि जिन कुछ जनपद पंचायतों में स्थानीय निधि बनाकर पेंशन दी जा रही है, वह किसी वैधानिक पेंशन योजना के तहत नहीं है। शासन ने ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे भुगतान के आधार पर अन्य कर्मचारी पेंशन का दावा नहीं कर सकते।
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की पीठ में मामले की सुनवाई हुई। यहां उर्मिला पाणिग्रही, कुंती देवांगन, सीमा ठाकुर, रमेश सिंह ठाकुर, अल्ताफ खान, गौकरण प्रसाद दुबे, संकीर्तन लाल साहू, नीलम बाम्बोडे, राकेश दुबे, राजेश कुमार लाल समेत विभिन्न जिलों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की 21 से अधिक याचिकाओं को सुनवाई के लिए रखा गया था।
कोर्ट ने साफ किया कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 131 केवल पहले से उपलब्ध वेतन, भत्ते और सेवानिवृत्ति लाभों को सुरक्षित रखने वाली व्यवस्था है। यदि पहले से पेंशन का अधिकार ही नहीं था तो इस धारा से नया पेंशन अधिकार पैदा नहीं किया जा सकता।
विभिन्न जिलों के कर्मचारियों ने 21 जुलाई 2025 के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनसे उनकी पेंशन की मांग खारिज कर दी गई थी। उनका कहना था कि उन्होंने पंचायतों में लंबे समय तक सेवा की, स्थायी कर्मचारी रहे और सेवानिवृत्त हुए। इनमें कई कर्मचारी ऐसे थे, जिनकी नियुक्ति 1993 का पंचायत राज अधिनियम लागू होने से पहले हुई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 131 उनकी पुरानी सेवा शर्तों और पेंशन संबंधी अधिकारों को संरक्षण देती है। उन्होंने यह भी कहा कि जनपद पंचायत गुंडरदेही, बालोद और तखतपुर, बिलासपुर में समान पदों पर काम कर चुके कुछ कर्मचारियों को पेंशन मिल रही है। इसलिए उन्हें इससे वंचित करना समानता के अधिकार के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया गया।
राज्य शासन ने कहा कि याचिकाकर्ता जनपद पंचायत के कर्मचारी थे, राज्य की सिविल सेवा के कर्मचारी नहीं। उनके लिए 1976 के संबंधित सेवा नियमों में सेवानिवृत्ति लाभ के रूप में भविष्य निधि की व्यवस्था थी। बाद में भी पंचायत सेवा के 1999 के नियमों में पेंशन का कोई प्रविधान नहीं किया गया। याचिकाकर्ता अंशदायी भविष्य निधि का लाभ ले चुके हैं।
दूसरी ओर गुंडरदेही के तीन और तखतपुर के तीन कर्मचारियों को संबंधित जनपद पंचायतों की सामान्य प्रशासन समितियों के प्रस्ताव से स्थानीय निधि बनाकर पेंशन दी जा रही है। इस भुगतान के आधार पर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए हैं।
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हाई कोर्ट ने कहा कि जनपद पंचायतों के कर्मचारी शासकीय सेवक नहीं हैं। पंचायत संस्थाएं स्वायत्त निकाय हैं और उनके कर्मचारियों की सेवा अलग नियमों से संचालित होती है। केवल सार्वजनिक कार्य करने से कोई पंचायत कर्मचारी राज्य का शासकीय सेवक नहीं बन जाता।
1976 के पेंशन नियम सरकारी सिविल सेवा के कर्मचारियों पर लागू होते हैं और अंशदायी भविष्य निधि का लाभ लेने वाले कर्मचारी भी इन नियमों के दायरे से बाहर हैं।
याचिकाकर्ता यह बताने में भी असफल रहे कि किस वैधानिक प्रविधान के तहत उन्हें पेंशन का अधिकार प्राप्त है। किसी दूसरे स्थान पर नियमों के विपरीत या विवादित तरीके से मिला लाभ दूसरे व्यक्ति के लिए कानूनी अधिकार नहीं बन सकता। गलत लाभ के आधार पर समानता की मांग नहीं की जा सकती।