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शिया युवक से निकाह पर फतवे का आरोप खारिज, हाई कोर्ट ने कहा- कानूनन बाध्यकारी नहीं फतवा

बिलासपुर हाईकोर्ट ने शिया युवक से निकाह करने पर सुन्नी परिवार के सामाजिक बहिष्कार की याचिका को साक्ष्यों के अभाव में खारिज करते हुए फतवे को गैर-बाध्यकारी करार दिया।

By Kamlesh RajakEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Fri, 06 Nov 2026 03:50:42 PM (IST)Updated Date: Fri, 06 Nov 2026 03:50:42 PM (IST)
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शिया युवक से निकाह पर फतवे का आरोप खारिज, हाई कोर्ट ने कहा- कानूनन बाध्यकारी नहीं फतवा
प्रतीकात्मक चित्र

HighLights

  1. शिया-सुन्नी निकाह मामले में सामाजिक बहिष्कार का आरोप खारिज।
  2. हाई कोर्ट ने कहा- फतवा कानून की तरह बाध्यकारी नहीं होता।
  3. पुलिस जांच में फतवा या बहिष्कार की नहीं हुई पुष्टि।

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: बालोद में सुन्नी मुस्लिम परिवार की बेटी का शिया युवक से निकाह होने के बाद परिवार के सामाजिक बहिष्कार का कथित फतवा जारी करने के मामले में हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता फतवे के लागू होने, सामाजिक बहिष्कार या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का ठोस प्रमाण नहीं दे सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फतवे को कानून की मान्यता नहीं है और उसे किसी व्यक्ति के अधिकारों के विरुद्ध बाध्यकारी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

बालोद निवासी यूसुफ खान और उनकी बहन आबिदा खातून ने याचिका में कहा था कि आबिदा की बेटी का निकाह 17 अगस्त 2019 को शिया समुदाय के अली अब्बास हेदरी से हुआ था। परिवार सुन्नी समुदाय से है। आरोप था कि 23 अगस्त 2019 को जामा मस्जिद की इंतजामिया कमेटी ने शादी में शामिल लोगों को मुस्लिम समुदाय से बाहर घोषित कर परिवार से दूरी रखने का फतवा जारी किया।


यह भी आरोप था कि उनकी निकाह अमान्य बताकर जीवनसाथी से दोबारा निकाह करने को कहा गया। यूसुफ खान ने दावा किया कि मस्जिद कमेटी के पदाधिकारियों के खिलाफ वित्तीय अनियमितता और गबन की शिकायत वक्फ बोर्ड में करने के बाद उन्हें निशाना बनाया गया। याचिकाकर्ताओं ने फतवा निरस्त करने और मुआवजे की मांग की थी।

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पुलिस जांच में बहिष्कार की पुष्टि नहीं

राज्य सरकार ने बताया कि उप पुलिस अधीक्षक की 15 जनवरी 2020 की जांच रिपोर्ट में फतवा जारी होने या सामाजिक बहिष्कार की पुष्टि नहीं हुई। निजी पक्षकारों ने कहा कि राय केवल सुन्नी और शिया समुदाय के बीच निकाह की वैधता पर थी और उसमें परिवार के बहिष्कार का निर्देश नहीं था।

कानून के तहत अन्य उपाय अपनाने की छूट

हाई कोर्ट ने 2014 के विश्व लोचन मदन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि फतवा न अदालत का आदेश है, न कानून की तरह बाध्यकारी। उसे बलपूर्वक लागू करना गैरकानूनी है। याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को कानून के तहत अन्य उपाय अपनाने की छूट दी।

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