
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। सुनने और बोलने में असमर्थ होना किसी व्यक्ति को अपने कानूनी हितों की रक्षा करने में अक्षम नहीं बनाता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति मानसिक अक्षमता के कारण मुकदमे में अपना पक्ष रखने में सक्षम नहीं है। हाई कोर्ट ने इस आधार पर जगदलपुर की एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने पति को दीवानी मुकदमे में अपना अगला मित्र (नेक्स्ट फ्रेंड) नियुक्त करने की मांग की थी।
न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत ने 30 अक्टूबर 2026 को सुनाए फैसले में कहा कि महिला की सुनने और बोलने संबंधी शारीरिक अक्षमता को अदालत नकार नहीं रही है, लेकिन केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वह अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ है। अदालत ने निचली अदालत के 4 अगस्त 2022 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
जगदलपुर की अबेदा बानो के नाम पर ग्राम नेक्टीसेमरा में खसरा नंबर 79 की 1.21 हेक्टेयर जमीन दर्ज थी। दंतेवाड़ा निवासी राजेश सुराना और सुनीता सुराना ने दावा किया कि अबेदा बानो ने 23 सितंबर 2010 को उनके पक्ष में जमीन बेचने का इकरारनामा किया था। सौदा 12.08 लाख रुपये में तय हुआ था और पांच लाख रुपये अग्रिम दिए गए थे।
खरीदारों का आरोप था कि जमीन का व्यपवर्तन और सीमांकन कराने सहित अन्य औपचारिकताएं पूरी कर रजिस्ट्री नहीं कराई गईं। इसके बाद उन्होंने अदालत में अनुबंध के पालन, इकरारनामे के आधार पर बिक्री विलेख कराने और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
दूसरी ओर, अबेदा बानो और उनके पति ने पहले एक अलग मुकदमा दायर कर इकरारनामे को शून्य घोषित करने की मांग की थी। बाद में उन्होंने दीवानी मुकदमे में पति को अपना अगला मित्र नियुक्त करने के लिए आवेदन दिया। उनका तर्क था कि जन्म से सुनने और बोलने में असमर्थ होने के कारण वह अदालत में अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख सकतीं।
हाई कोर्ट ने पाया कि महिला शिक्षित हैं और पहले भी कई कानूनी तथा आर्थिक लेन-देन कर चुकी हैं। उन्होंने अन्य संपत्ति संबंधी सौदे भी किए हैं और अपने नाम से जारी पैन कार्ड का इस्तेमाल किया है। मुकदमे की शुरुआत से ही उन्होंने अधिवक्ता नियुक्त किया हुआ है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जिससे पता चले कि महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं या मानसिक अक्षमता के कारण अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकतीं।
अदालत ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 32 नियम 15 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अगला मित्र नियुक्त करने के लिए केवल शारीरिक अक्षमता पर्याप्त नहीं है। यह स्थापित होना चाहिए कि मानसिक दुर्बलता के कारण वह मुकदमे में अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ है।
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हाई कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 का हवाला देते हुए कहा कि बोलने में असमर्थ व्यक्ति लिखकर या संकेतों के माध्यम से भी गवाही दे सकता है। जरूरत पड़ने पर अदालत दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता ले सकती है। महिला भी लिखकर, संकेतों या आवश्यक सहायता के माध्यम से अपने निर्देश दे सकती हैं और अपने अधिवक्ता के जरिए मुकदमा लड़ सकती हैं।
पति भी उन्हें संवाद करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन केवल इस आधार पर उन्हें अगला मित्र नियुक्त करने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने माना कि निचली अदालत ने पति को अगला मित्र नियुक्त करने का आवेदन खारिज कर कोई गलती नहीं की। इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।
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