
धीरेंद्र सिन्हा, नईदुनिया, बिलासपुर। दीपावली पर घरों में जगमगाते दीपों के पीछे बाजारों की चहल-पहल और कारोबार की लंबी श्रृंखला होती है। इन बाजारों तक सामान पहुंचाने में रेलवे की भूमिका अक्सर नजरों से ओझल रह जाती है। बिलासपुर रेलवे स्टेशन की कहानी भी इसी सफर से जुड़ी है। वर्ष 1890 में व्यापार को गति देने के लिए विकसित यह स्टेशन आज माल ढुलाई, यात्री सेवा और त्योहारों की तैयारियों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बन चुका है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज बिलासपुर रेलवे स्टेशन की यात्रा ब्रिटिश हुकूमत के दौर से शुरू होकर आज के आधुनिक भारत तक पहुंच चुकी है। वर्ष 1890 में नागपुर-बंगाल रूट पर बिलासपुर को रेलवे जंक्शन बनाया गया। इसकी स्थापना के पीछे व्यापार को बढ़ावा देने की सोच थी। शुरुआती दौर में मालगाड़ियों का परिचालन महत्वपूर्ण रहा।
उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यही रेल नेटवर्क भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी का अहम आधार बनेगा। आज दिवाली जैसे बड़े त्योहारों पर रेलवे की यह भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। बाजारों में बिकने वाले कपड़े, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, औद्योगिक सामग्री और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति में रेल परिवहन बड़ी भूमिका निभाता है।
रेलवे मार्केट से लेकर बिलासपुर के व्यापार विहार, गोल बाजार, सदर बाजार, शनिचरी, तिफरा से लेकर शहर के अलग-अलग बाजारों तक कारोबार की गतिविधियां व्यापक आपूर्ति व्यवस्था से जुड़ी हैं। रेलवे लंबी दूरी तक माल पहुंचाकर व्यापारियों और उद्योगों को परिवहन का मजबूत माध्यम उपलब्ध कराती है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर जोन माल ढुलाई के लिए देश में अग्रणी पहचान रखता है। हालांकि रेलवे की अहमियत केवल राजस्व तक सीमित नहीं है।
त्योहारों पर घर लौटते यात्रियों की सुविधा, आरक्षण, सुरक्षा और संरक्षा भी इसकी जिम्मेदारी है। कभी घोड़ी-टांगा यात्रियों को स्टेशन से घर तक पहुंचाने का माध्यम था, जबकि आज सिटी बस, आटो-टैक्सी और दिव्यांगों के लिए सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस तरह बिलासपुर का ऐतिहासिक स्टेशन व्यापार और जनसेवा, दोनों की विरासत को आगे बढ़ा रहा है।
बिलासपुर जोनल स्टेशन का इतिहास केवल यातायात के विकास की कहानी नहीं है। वर्ष 1867 में मध्य प्रांत के तत्कालीन कमिश्नर रिचर्ड टेंपल ने इस भवन को रेलवे स्टेशन बनाने की सलाह दी थी। इसके बाद 1890 में नागपुर-बंगाल रूट पर बिलासपुर को जंक्शन का स्वरूप मिला। शुरुआती दौर में व्यापार इसकी प्राथमिकता था। समय के साथ यही रेल संपर्क उद्योगों, बाजारों और यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण आधार बन गया।
बिलासपुर की रेलवे विरासत में साउथ बेस्ट इंस्टीट्यूट का भवन भी विशेष स्थान रखता है। इसका निर्माण वर्ष 1885 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने करवाया था। उस समय इसे यूरोपियन क्लब कहा जाता था और अंग्रेज अफसर इसका उपयोग रेस्ट हाउस के रूप में करते थे।
दो मंजिला ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन भवन और यह पुरानी इमारत शहर के अतीत की याद दिलाती हैं। भले ही अब यह बच्चों का प्रायमरी विंग बन चुका है। आज इनसे बिलासपुर की ऐतिहासिक पहचान भी जुड़ी है।
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रेलवे स्टेशन की पहचान केवल माल ढुलाई और व्यापार तक सीमित नहीं है। ऐतिहासिक भवन के सामने तिरंगे के नीचे तस्वीर खिंचवाना यात्रियों के लिए गौरव का अनुभव बन चुका है। रेलवे ने स्टेशन को धरोहर के रूप में विकसित किया है। स्वच्छता, सुरक्षा, संरक्षा और ऑनलाइन आरक्षण जैसी सुविधाओं ने यात्रा के अनुभव को बदला है। पुराने दौर की सीमित व्यवस्थाओं से आधुनिक परिवहन तक का यह बदलाव शहर की प्रगति की कहानी भी कहता है।