
अतुल वासिंग नईदुनिया प्रतिनिधि,बिलासपुर: छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) और जिला अस्पताल का नाम भले ही संभाग के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में है, लेकिन यहां इलाज की आस लेकर आने वाले मरीजों के हिस्से सिर्फ ज्यादातर संघर्ष और लाचारी आ रही है। स्थिति यह है कि गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को न तो समय पर दवाइयां मिल पा रही हैं और न ही जरूरी जांच।
सिम्स में तो मरीजों की भीड़ रहती है, इसलिए भी कई बार मरीज अव्यवस्था के शिकार होते हैं, लेकिन जिला अस्पताल की चिकित्सकीय व्यवस्था बदहाल है। एक तरह से जिलेवासियों को संजीवनी देने वाले दोनों ही अस्पताल को खुद ही संजीवन की अवश्यकता पड़ रही है।
नईदुनिया की टीम ने जब इन दोनों अस्पतालों का पड़ताल किया तो कई अहम बातें सामने आई। इससे यह पता चला कि जिला अस्पताल और सिम्स में संसाधन की कमी नहीं है, लेकिन इनका सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। वही सिम्स जैसे बड़े अस्पताल में मरीजों की इतनी अधिक भीड़ रहती है कि कई बार इलाज पाने में दिक्कत होती है तो कई बार स्टाफ भी लापरवाही करने से बाज नहीं आते ।
वर्तमान में सिम्स में तमाम सुविधाएं है, लेकिन इसके बाद भी सीटी स्कैन, एमआरआइ, सोनोग्राफी जांच कराने के लिए तीन से चार सप्ताह का समय लगता है।आवश्यक दवाएं भी कई बार मरीजों के पहुंच से दूर हो जाती है। रात के समय इलाज भगवान भरोसे रहता है।वहीं जिला अस्पताल की हालत तो सबसे ज्यादा खराब है। ज्यादातर चिकित्सक सेवा के नाम पर खानापूर्ति करते हुए नजर आते हैं, जो मरीजों और गर्भवती महिलाओं को सीधे रेफर करते हुए सिम्स में चिकित्सकीय दवाब बढ़ाने का काम करते हैं। वही जिला अस्पताल में रात के समय की हालत तो सबसे ज्यादा गंभीर रहती है। रात में यदि कोई पहुंच रहा है तो
तत्काल मरीज को उपचार मिलना मुमकिन नजर नहीं आया। इस दौरान डाक्टर नदारत रहे और अस्पताल का आपातकालीन नर्स के भरोसे चल रहा था।
सुबह नौ बजे से सिम्स की ओपीडी (बाह्य रोगी विभाग) के बाहर पर्ची काउंटर से लेकर डाक्टरों के कमरों तक लंबी-लंबी कतारें लग जाती है। घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद जब मरीज डाक्टर तक पहुंचता है, तो उसे सिर्फ तारीखें मिलती हैं। वहीं, शाम ढलने के बाद और रात के वक्त इमरजेंसी सेवाओं का हाल बदतर हो जाता है। रात में विशेषज्ञ डाक्टर नदारद रहते हैं और पूरा जिम्मा जूनियर रेजिडेंट्स या इंटर्न के भरोसे रहता है, जिससे गंभीर मरीजों की जान पर हर वक्त खतरा मंडराते रहता है।
सिम्स में सीटी स्कैन, एमआरआइ और सोनोग्राफी जैसी आधुनिक जांच मशीनों के होने के बावजूद मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। स्थिति यह है कि डाक्टर द्वारा लिखी जाने वाली इन जरूरी जांचों के लिए मरीजों को तीन से चार सप्ताह तक की वेटिंग दी जा रही है। गंभीर रूप से पीड़ित मरीज एक महीने तक दर्द सहकर इंतजार नहीं कर सकते। ऐसे में मजबूर होकर उन्हें निजी डायग्नोस्टिक सेंटर्स में अपनी कमाई लुटानी पड़ रही है, जहां एक सीटी स्कैन या एमआरआइ के एवज में हजारों रुपये वसूले जा रहे हैं।
एक तरफ जहां सिम्स में वेटिंग की मार है, वहीं जिला अस्पताल में स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता की इंतहा देखिए। यहां अस्पताल भवन में सीटी स्कैन मशीन तो स्थापित कर दी गई है, लेकिन उसे संचालित करने के लिए रेडियोलाजिस्ट लाने मशक्कत करनी पड़ी है। वही जो है वह भी सीमित जांच कर रहे है। नतीजतन करोड़ों रुपये की मशीन सिर्फ शोपीस बनकर रह गई है। गरीब मरीजों को छोटी-छोटी जांच के लिए भी इधर-उधर भटकना पड़ रहा है और प्रशासनिक सुस्ती का खामियाजा आम जनता भुगत रही है।
यह भी पढ़ें- जांजगीर—चांपा में सनसनीखेज वारदात, 4 साल के प्रेम संबंध के बाद युवती ने प्रेमी पर फेंका एसिड
सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त दवाइयां देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। सिम्स और जिला अस्पताल के दवा वितरण केंद्रों में हमेशा आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं की कमी बनी रहती है। सबसे बुरा हाल हार्ट (दिल), किडनी (गुर्दा) और लिवर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे मरीजों का है। इन बीमारियों के नियमित और महंगे इलाज के लिए डाक्टर जो दवाइयां लिखते हैं, वे अस्पताल के काउंटर पर अमूमन नहीं मिलती हैं। बाहर से ये दवाइयां खरीदना गरीब मरीजों के वश के बाहर होता है, जिससे कई बार उनका इलाज बीच में ही बाधित हो जाता है।
जांच की वेटिंग ने बढ़ाई दिक्कत
जरहाभाठा निवासी हिमराज सोनवानी का कहना है कि मेरे स्वजन को सिम्स में डाक्टर ने सोनोग्राफी कराने की सलाह दी, लेकिन जब वे जांच केंद्र गए तो उन्हें 25 दिन बाद की तारीख थमा दी गई। तब बताया गया कि डाक्टर कह रहे हैं कि अंदरूनी ब्लीडिंग का खतरा है, तुरंत सोनोग्राफी कराओ। लेकिन वे नहीं माने, परिणाम स्वरुप बाहर जांच कराने के लिए बाध्य होना पड़ा।
रात में इलाज भगवान भरोसे
उसलापुर निवासी लक्ष्मण प्रसाद लहरे का कहना है कि जिला अस्पताल में कई बार रात के समय आसपास के रहवासियों को स्वास्थ्यगत समस्या होने पर पहुंचते हैं। लेकिन आपातकालीन में इलाज कराने के लिए मशक्कत करनी पड़ पड़ती है। यदि मरीज गंभीर होता तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते थे। व्यवस्था में सुधार करना जरुरी हो गया है।
- नहीं मिलती है जरुरी दवाएं
जरहाभाठा निवासी नागेंद्र ठाकुर ने बताया कि सिम्स हो या जिला अस्पताल निश्शुल्क दवाओं के लिए काफी मशक्कत करना पड़ता है। डाक्टर जितनी भी दवा लिखे, स्टोर में आधी ही मिलती है।यदि डाक्टर ने तीन तरह की दवा लिखी है तो दो ही प्रकार की दवा मिलेगी, यह व्यवस्था हमेशा से बनी हुई है।
सिम्स के एमएस डा़ लखन सिंह का कहना है कि यहां मरीजों का लोड क्षमता से बहुत अधिक रहता है, फिर भी हम सभी को स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं देने का प्रयास कर रहे हैं। सीटी स्कैन और एमआरआइ की वेटिंग को कम करने के लिए मशीनों के संचालन के घंटे बढ़ाने पर विचार चल रहा है। अन्य व्यवस्था भी धीरे-धीरे दूरुस्त की जा रही है।
सिविल सर्जन ने नहीं उठाया फोन
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डा़. एस कुजूर से इस संबंध में जानकारी लेने के लिए संपर्क किया गया तो उन्होंने फोन रीसिव नहीं किया। इसकी वजह से जिला अस्पताल प्रबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सका है।