नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बेटे की आत्महत्या के बाद उसकी कथित प्रेमिका को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में घिरे ससुर की चार्जशीट रद्द करने की मांग खारिज कर दी है।
कोर्ट ने कहा कि आरोपित ने महिला से कथित तौर पर कहा था कि “मेरे बेटे की मौत तुम्हारी वजह से हुई है और तुम्हें भी जीने का अधिकार नहीं है।”
यह कथन महज दुख और गुस्से की अभिव्यक्ति था या महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने की मंशा से कहा गया था, इसका फैसला साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ट्रायल कोर्ट करेगा। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अरुण कुमार गुप्ता उर्फ लाला गुप्ता की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया।
बेटे की मौत के बाद बहू ने की आत्महत्या
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता अरुण कुमार गुप्ता के बेटे निखिल गुप्ता की 20 जून 2025 को जहरीला पदार्थ खाने से मौत हो गई थी। अभियोजन के अनुसार निखिल का अपनी रिश्ते की महिला नेहा गुप्ता से संबंध था। इसे लेकर गांव में चर्चाएं होने से निखिल मानसिक तनाव में था।
निखिल की मौत के बाद उसके पिता ने कथित रूप से नेहा को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि उसके कारण ही बेटे की मौत हुई और उसे भी जीने का कोई अधिकार नहीं है। इसके बाद 19 अगस्त 2025 को नेहा ने अपने ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
इस मामले में 20 फरवरी 2026 को सीतापुर थाने में बीएनएस की धारा 100 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध दर्ज किया गया। जांच के बाद पुलिस ने 12 अप्रैल 2026 को आरोप पत्र पेश किया। इसके बाद मामला अंबिकापुर के छठे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष लंबित है।
ससुर का तर्क- सुसाइड नोट में मेरा नाम तक नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि कथित बयान बेटे की मौत के बाद दुख, गुस्से और भावनात्मक तनाव में दिया गया था। इसमें आत्महत्या के लिए उकसाने की मंशा नहीं थी। महिला के सुसाइड नोट में भी याचिकाकर्ता के खिलाफ धमकी, प्रताड़ना या उकसाने का कोई आरोप नहीं है। नोट में केवल उसके प्रति ‘सॉरी’ कहे जाने का उल्लेख है।
यह भी दलील दी गई कि निखिल की आत्महत्या के मामले में अभियोजन ने खुद नेहा और उसकी मां सरिता गुप्ता पर निखिल को प्रताड़ित करने के आरोप लगाए हैं। इसलिए बेटे की मौत से दुखी पिता के कथित बयान को उसी भावनात्मक परिस्थिति में देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा- सुसाइड नोट अकेले आरोप खत्म नहीं करता
हाई कोर्ट ने माना कि सुसाइड नोट में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई स्पष्ट आरोप नहीं होना बचाव पक्ष के लिए महत्वपूर्ण तथ्य है। लेकिन केवल इस आधार पर इस स्तर पर पूरी अभियोजन कहानी को खत्म नहीं किया जा सकता। पुलिस ने याचिकाकर्ता के कथित बयान के अलावा अन्य साक्ष्य भी जुटाए हैं।
कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में उकसावे या जानबूझकर मदद करने के साथ आपराधिक मंशा का होना जरूरी है। केवल गुस्से में कही गई बात सामान्यतः उकसावे का अपराध नहीं बनती। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपित की ओर से ऐसा सकारात्मक और निकटवर्ती कृत्य होना चाहिए, जिससे आत्महत्या के लिए उकसाने का स्पष्ट संबंध सामने आए।
‘गुस्से में कहा या उकसाया’, ट्रायल में होगा फैसला
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुख्य सवाल यही है कि कथित बयान किस परिस्थिति में दिया गया था और क्या उसके पीछे आत्महत्या के लिए उकसाने की मंशा थी। इसके लिए गवाहों के बयान, पक्षकारों का आचरण, कथन का प्रभाव और अन्य परिस्थितियों के साक्ष्यों का मूल्यांकन जरूरी है।
हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 528 बीएनएसएस के तहत याचिका पर सुनवाई करते हुए वह इस स्तर पर साक्ष्यों का
सूक्ष्म परीक्षण कर ट्रायल जैसा निष्कर्ष नहीं दे सकता। अभियोजन का मामला प्रथमदृष्टया पूरी तरह असंभव या मनगढ़ंत नहीं है, इसलिए चार्जशीट और आगे की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियां केवल चार्जशीट रद्द करने की याचिका तक सीमित हैं। ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से तय करेगा कि आरोपित दोषी है या नहीं।