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ओडिशा की स्टील कंपनी को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से राहत, वादी के अधिकार और वादपत्र के तथ्यों को दी गई प्राथमिकता

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर उच्च न्यायालय ने 57 लाख 18 हजार 409 रुपये की वसूली के एक वाणिज्यिक मुकदमे में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए निचली अदालत (वाणिज्यिक...और पढ़ें

By Kamlesh RajakEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Wed, 07 Oct 2026 05:24:58 PM (IST)Updated Date: Wed, 07 Oct 2026 05:24:58 PM (IST)
ओडिशा की स्टील कंपनी को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से राहत, वादी के अधिकार और वादपत्र के तथ्यों को दी गई प्राथमिकता
प्रतीकात्मक चित्र

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पलटा वाणिज्यिक न्यायालय का निर्णय।
  2. वसूली मुकदमे में व्यापारी को पक्षकार बनाए रखने का निर्देश।
  3. शुरुआती चरण में यह तय नहीं किया जा सकता कि व्यापारी की भूमिका थी या नहीं।

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: ₹57 लाख 18 हजार 409 रुपये की वसूली के लिए दायर वाणिज्यिक मुकदमे में एक व्यापारी को पक्षकारों की सूची से हटाने के वाणिज्यिक न्यायालय के आदेश को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि वादी ने व्यापारी की भूमिका को लेकर वादपत्र में पर्याप्त तथ्य रखे हैं। इसलिए मुकदमे की शुरुआती अवस्था में उसे पक्षकार से हटाना उचित नहीं है। उसकी भूमिका सही थी या नहीं, इसका फैसला साक्ष्य के आधार पर मुकदमे के दौरान होगा।

मामला जाजली ज्योति स्टील लिमिटेड की ओर से संचालक संदीप नायर, निवासी ग्राम तैनसर, बिरकेरा के पास, सुंदरगढ़, ओडिशा द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। कंपनी ने हरिकृष्ण अग्रवाल, प्रोपराइटर महामाया स्टील एजेंसी, पाटवा कांप्लेक्स, एमजी रोड, रायपुर और गलवालिया इस्पात उद्योग प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली के खिलाफ वसूली का मुकदमा दायर किया था।


कंपनी का कहना था कि हरिकृष्ण अग्रवाल ने गलवालिया इस्पात उद्योग की ओर से 29 मई 2019 और 4 जून 2019 को क्रमश: खरीद आदेश क्रमांक 661 और 721 जारी किए थे। इन आदेशों के आधार पर स्पंज आयरन की आपूर्ति की गई। कंपनी ने दावा किया कि दोनों आदेशों के लिए 2 करोड़ 37 लाख 18 हजार रुपये अग्रिम राशि भी दी गई थी। वाणिज्यिक न्यायालय ने 20 नवंबर 2024 को हरिकृष्ण अग्रवाल की अर्जी स्वीकार करते हुए उन्हें मुकदमे से हटाने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ कंपनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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दोनों पक्षों की दलील

कंपनी के वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील ओटवानी ने कहा कि वादपत्र में व्यापारी की भूमिका स्पष्ट रूप से बताई गई है। खरीद आदेशों के संबंध में विवाद है, जिसे साक्ष्य के जरिए ही तय किया जा सकता है। वहीं हरिकृष्ण अग्रवाल की ओर से कहा गया कि वास्तविक खरीद आदेश गलवालिया इस्पात उद्योग ने जारी किए थे। उनके द्वारा जारी दस्तावेज केवल सौदा-पत्र थे, जिनका उद्देश्य मात्रा और कीमत की पुष्टि करना था। उन्होंने किसी भुगतान से भी इनकार किया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि वादपत्र और लिखित जवाब दोनों को देखने से व्यापारी की भूमिका को लेकर पर्याप्त आधार सामने आता है। इसलिए उसे बिना साक्ष्य के मुकदमे से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट मामले में दिए सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि वादी सामान्यतः यह तय कर सकता है कि वह किन लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाना चाहता है। यदि किसी व्यक्ति की मौजूदगी विवाद के सभी प्रश्नों के प्रभावी और पूर्ण निपटारे के लिए जरूरी हो सकती है, तो उसे पक्षकार बनाया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने 20 नवंबर 2024 का वाणिज्यिक न्यायालय का आदेश रद्द करते हुए हरिकृष्ण अग्रवाल को हटाने की अर्जी खारिज कर दी। वाणिज्यिक न्यायालय को मामले की सुनवाई पक्षकारों के वर्तमान स्वरूप में कानून के अनुसार करने और गुण-दोष के आधार पर फैसला करने का निर्देश दिया गया।