नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। बिलासपुर के देवरीखुद स्थित रिहायशी जमीन के विवाद में हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए तहसीलदार और राजस्व मंडल के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थायी निर्माण वाली रिहायशी संपत्ति से जुड़े विवाद में यदि मांगी गई राहत वस्तुतः निषेधाज्ञा या रोक लगाने की है तो राजस्व न्यायालय को उस पर कार्यवाही करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार सक्षम सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में आता है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने लक्ष्मण माणिकपुरी और उत्तरा माणिकपुरी की याचिका स्वीकार करते हुए बिलासपुर तहसीलदार का 20 जून 2022 का आदेश और उसके आधार पर राजस्व मंडल बिलासपुर का 18 सितंबर 2025 का आदेश निरस्त कर दिया।
याचिकाकर्ता लक्ष्मण माणिकपुरी, 64 वर्ष, पिता स्वर्गीय पुरुखु, तथा उनकी पत्नी उत्तरा माणिकपुरी, 51 वर्ष, निवासी देवरीखुद, बहोरा होटल के पास, कॉलोनी चौक, बिलासपुर हैं। उन्होंने राजस्व मंडल के 18 सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि तहसीलदार ने 20 जून 2022 को ऐसा आदेश पारित किया, जिसके लिए उसे क्षेत्राधिकार ही प्राप्त नहीं था।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि एक अक्टूबर 2020 के बाद तहसीलदार द्वारा मैनुअल तरीके से की गई कार्यवाही शासन के 15 जून 2020 के परिपत्र के विपरीत थी। इसके अलावा उन्होंने राजस्व मंडल की कार्यवाही में अध्यक्ष की सील के कथित इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर आपत्तियां उठाईं और संबंधित सदस्यों को ऐसी सील इस्तेमाल करने का वैध अधिकार होने संबंधी दस्तावेज पेश करने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने हाई कोर्ट को बताया कि रिहायशी संपत्ति के संबंध में राजस्व न्यायालय के क्षेत्राधिकार का यही प्रश्न कोर्ट पहले ही नीरज जैन एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य मामले में 7 सितंबर 2026 को तय कर चुका है। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि स्थायी निर्माण वाले मकान अथवा रिहायशी जमीन के संबंध में निषेधाज्ञा देने का अधिकार राजस्व न्यायालय को नहीं है। ऐसे मामलों में सिविल कोर्ट ही टाइटल और निषेधाज्ञा से संबंधित विवाद तय कर सकता है। हाई कोर्ट ने वर्तमान मामले में भी उसी कानूनी सिद्धांत को लागू किया।
तहसीलदार का आदेश ही अधिकार क्षेत्र से बाहर
हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में 20 जून 2022 के तहसीलदार के आदेश को ही इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि तहसीलदार के पास ऐसी कार्यवाही करने का अधिकार नहीं था। कोर्ट ने पाया कि यह विवाद 7 सितंबर के नीरज जैन फैसले में तय कानूनी स्थिति के दायरे में आता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल कार्यवाही ही अधिकार क्षेत्र के बाहर पाई जाती है तो उस पर आधारित राजस्व मंडल का बाद का आदेश भी कायम नहीं रह सकता। इसी आधार पर तहसीलदार के समक्ष शुरू हुई पूरी कार्यवाही और 20 जून 2022 का आदेश निरस्त कर दिया गया।
राजस्व मंडल का आदेश भी रद
हाई कोर्ट ने इसके साथ ही राजस्व मंडल बिलासपुर द्वारा 18 सितंबर 2025 को पारित आदेश को भी निरस्त कर दिया। इस तरह याचिकाकर्ताओं को दोनों स्तरों पर राहत मिली। कोर्ट ने कहा कि राजस्व मंडल का आदेश जिस मूल कार्यवाही से निकला था, जब वही कार्यवाही अधिकार क्षेत्र के अभाव में टिकाऊ नहीं है तो उसके आधार पर पारित आदेश भी कायम नहीं रखा जा सकता।
जमीन के मालिकाना हक पर कोर्ट ने नहीं दी राय
फैसले में हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण रूप से स्पष्ट किया कि उसने संबंधित जमीन के टाइटल, स्वामित्व या कब्जे को लेकर किसी पक्ष के दावे के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। कोर्ट ने सभी पक्षों को कानून के तहत उपलब्ध उचित उपाय सक्षम न्यायालय के समक्ष अपनाने की स्वतंत्रता दी है।
यानी तहसीलदार और राजस्व मंडल की कार्यवाही रद्द होने का अर्थ यह नहीं है कि हाई कोर्ट ने किसी पक्ष को जमीन का मालिक घोषित कर दिया है। मूल स्वामित्व अथवा कब्जे का विवाद यदि कायम है तो उसका फैसला सक्षम न्यायालय ही करेगा।
सील के आरोपों पर अलग फैसला जरूरी नहीं
याचिकाकर्ताओं ने राजस्व मंडल के सदस्यों द्वारा अध्यक्ष की सील के कथित इस्तेमाल, बोर्ड की संरचना और प्राधिकरण से जुड़े कई अन्य राहत भी मांगी थीं। हाई कोर्ट ने कहा कि जब तहसीलदार की मूल कार्यवाही और उसके आधार पर राजस्व मंडल का आदेश ही निरस्त किया जा रहा है तो सील के कथित इस्तेमाल तथा उससे जुड़े अनुशासनात्मक या प्रशासनिक निर्देशों पर अलग से निर्णय देना आवश्यक नहीं है।