नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भरण-पोषण के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल किसी व्यक्ति के पास इंजीनियरिंग की डिग्री होने से यह स्वतः नहीं माना जा सकता कि उसकी आय उसकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने यह आदेश विवेक मोदी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया। पति ने बताया था कि वह नियमित नौकरी में नहीं है और जोमैटो व रैपिडो के माध्यम से डिलीवरी का काम कर करीब 10 से 15 हजार रुपये प्रतिमाह कमाता है।
पत्नी ने मांगे थे 30 हजार रुपये
मामले के अनुसार विवेक मोदी और स्वाति का विवाह 28 नवंबर 2023 को हुआ था। पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और मारपीट कर उसे मायके भेज दिया गया। वह फरवरी 2024 से अलग रह रही है। पत्नी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत आवेदन
देकर 30 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की थी।
फैमिली कोर्ट ने 24 सितंबर 2025 को आवेदन आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पति को आवेदन दाखिल करने की तारीख से 9 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
पति बोला- 10 से 15 हजार ही कमाई
पति ने हाई कोर्ट में कहा कि उसकी कोई नियमित नौकरी नहीं है। वह डिलीवरी का काम करता है और करीब 10 से 15 हजार रुपये प्रतिमाह कमाता है। उसने अपनी बात के समर्थन में जोमैटो का पहचान पत्र और ई-श्रम कार्ड भी पेश किया था। उसका यह भी कहना था कि उसके नाम दर्ज वाहन उसके पिता को एसईसीएल में करीब 40 वर्ष की सेवा के बाद मिले सेवानिवृत्ति लाभ से खरीदा गया था, इसलिए इसे उसकी नियमित आय का आधार नहीं माना जा सकता।
इंजीनियर होने का मतलब अधिक आय नहीं
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पति के पास मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री होना अपने आप में यह मानने का आधार नहीं हो सकता कि वह अपनी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप आय अर्जित कर रहा है। कोर्ट ने उसके जोमैटो पहचान पत्र और ई-श्रम कार्ड को उसकी वास्तविक और नियमित आय का आकलन करने के लिए प्रासंगिक माना।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बकाया राशि जमा कर देने मात्र से पति की भरण-पोषण की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
54 हजार जमा, गिरफ्तारी वारंट निरस्त
के दौरान पति ने 54 हजार रुपये के बकाया भरण-पोषण की राशि जमा कर दी थी। इस तथ्य को देखते हुए हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट को निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति को आगे हर महीने 5 हजार रुपये पत्नी को नियमित रूप से भरण-पोषण के रूप में देना होगा।
कोर्ट ने इस सीमा तक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मामले की प्रति संबंधित फैमिली कोर्ट को आवश्यक अनुपालन के लिए भेजने का निर्देश दिया।