
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासी के पक्ष में हस्तांतरण के मामले में केवल जमीन का नगरीय क्षेत्र या नजूल भूमि होना उसे कानूनी प्रतिबंधों से बाहर नहीं करता। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कोंडागांव की जमीन से जुड़े विवाद में यह स्पष्ट करते हुए खरीदार पक्ष की याचिका खारिज कर दी है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि अनुसूचित जनजाति के भूमिस्वामी की जमीन के हस्तांतरण पर लागू वैधानिक शर्तों, विशेषकर सक्षम अधिकारी की पूर्व अनुमति, का पालन साबित करना जरूरी है। केवल पंजीकृत बिक्री पत्र और मूल विक्रेता की ओर से जीवनकाल में आपत्ति नहीं किए जाने से यह शर्त समाप्त नहीं होती।
मामला कोंडागांव नगर क्षेत्र के खसरा नंबर 423 की 0.17 एकड़ जमीन का है। गजेंद्र ध्रुव ने 4 नवंबर 2016 को भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी के तहत जमीन का कब्जा वापस दिलाने के लिए आवेदन किया था। उनका दावा था कि जमीन उनके पूर्वजों के नाम वर्ष 1934-35 से दर्ज थी और दूसरे पक्ष ने उस पर अवैध कब्जा कर लिया है।
दूसरी ओर, प्रेमचंद, मोहनलाल, शांतिलाल, सुरेश कुमार, कांतिलाल, ललित, मंजू, कंचनबाई और किरणबाई सहित खरीदार पक्ष ने बताया कि उनके पिता केवलचंद ने 23 जनवरी 1960 को शंभूनाथ से करीब 12 डिसमिल जमीन पंजीकृत बिक्री पत्र के जरिए खरीदी थी। शेष जमीन 3 दिसंबर 1974 को श्यामलाल को बेची गई थी। बाद में यह जमीन प्रेमचंद के पक्ष में आई। उनका कहना था कि परिवार कई दशकों से वहां मकान बनाकर रह रहा है और जमीन नजूल की है, इसलिए आदिवासी भूमि हस्तांतरण संबंधी प्रतिबंध लागू नहीं होते।
अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ने 13 अक्टूबर 2017 को जमीन नगरपालिका क्षेत्र में होने और कृषि भूमि नहीं होने के आधार पर गजेंद्र ध्रुव का आवेदन खारिज कर दिया था। कलेक्टर ने 9 जुलाई 2020 को इस आदेश को निरस्त कर दिया। संभागायुक्त ने 5 अक्टूबर 2021 को खरीदार पक्ष की पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर कलेक्टर का आदेश बरकरार रखा। इसके बाद खरीदार पक्ष ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि बिक्री पत्रों के 42 से 56 साल बाद वर्ष 2016 में कार्रवाई शुरू की गई, इसलिए यह अत्यधिक देरी के कारण स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के शकुंतला मामले का हवाला दिया। यह भी कहा कि जमीन नजूल क्षेत्र में है और एक पुराने लेनदेन से जुड़े पक्षकारों को प्रकरण में शामिल नहीं किया गया।
हाई कोर्ट ने कहा कि भू-राजस्व संहिता की धारा 165(6) में अधिसूचित आदिम जनजाति के भूमिस्वामी की जमीन गैर-आदिवासी को हस्तांतरित करने पर प्रतिबंध है। प्रावधान में नगरपालिका क्षेत्र की जमीन को केवल नगरीय स्थिति के आधार पर छूट नहीं दी गई है। राजस्व मंडल के 27 अक्टूबर 2015 के स्पष्टीकरण में भी नजूल, नगरीय और परिवर्तित भूमि पर इन प्रतिबंधों का उल्लेख है। याचिकाकर्ताओं ने स्वीकार किया कि बिक्री के समय सक्षम अधिकारी की अनुमति नहीं ली गई थी।
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कोर्ट ने माना कि कई दशक की देरी महत्वपूर्ण पहलू है और बिना निर्धारित समय-सीमा वाले कानून में भी कार्रवाई उचित समय के भीतर होनी चाहिए। हालांकि, इस मामले में दस्तावेज के आधार पर याचिकाकर्ता आदेशों में हस्तक्षेप का आधार साबित नहीं कर सके। पंजीकृत बिक्री पत्र भी वैधानिक अनुमति की अनिवार्यता का विकल्प नहीं हो सकते। इस आधार पर हाई कोर्ट ने संभागायुक्त के 5 अक्टूबर 2021 के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
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