
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन देने की मांग छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने खारिज कर दी है। जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने उर्मिला पाणिग्रही, कुंती देवांगन, सीमा ठाकुर, रमेश सिंह ठाकुर, अल्ताफ खान, गौकरण प्रसाद दुबे, संकीर्तन लाल साहू, नीलम बाम्बोडे, राकेश दुबे, राजेश कुमार लाल समेत विभिन्न जिलों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की 21 से अधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि जनपद पंचायत के कर्मचारी राज्य के शासकीय सेवक नहीं हैं। उनके लिए अलग सेवा नियम हैं और पेंशन का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
कोर्ट ने साफ किया कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 131 केवल पहले से उपलब्ध वेतन, भत्ते और सेवानिवृत्ति लाभों को सुरक्षित रखने वाली व्यवस्था है। यदि पहले से पेंशन का अधिकार ही नहीं था तो इस धारा से नया पेंशन अधिकार पैदा नहीं किया जा सकता।
बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, रायगढ़, बिलासपुर, मुंगेली, धमतरी, सक्ती, कांकेर, दुर्ग, सुकमा और कोरबा सहित विभिन्न जिलों के कर्मचारियों ने 21 जुलाई 2025 के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनसे उनकी पेंशन की मांग खारिज कर दी गई थी। उनका कहना था कि उन्होंने पंचायतों में लंबे समय तक सेवा की, स्थायी कर्मचारी रहे और सेवानिवृत्त हुए। इनमें कई कर्मचारी ऐसे थे, जिनकी नियुक्ति 1993 का पंचायत राज अधिनियम लागू होने से पहले हुई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 131 उनकी पुरानी सेवा शर्तों और पेंशन संबंधी अधिकारों को संरक्षण देती है। उन्होंने यह भी कहा कि जनपद पंचायत गुंडरदेही, बालोद और तखतपुर, बिलासपुर में समान पदों पर काम कर चुके कुछ कर्मचारियों को पेंशन मिल रही है। इसलिए उन्हें इससे वंचित करना समानता के अधिकार के खिलाफ है। पेंशन को अर्जित सेवानिवृत्ति लाभ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के डीएस नाकारा और जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत कर्मचारी संघ के फैसलों का भी हवाला दिया गया।
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शासन ने बताया- भविष्य निधि का लाभ मिल चुका
राज्य शासन ने कहा कि याचिकाकर्ता जनपद पंचायत के कर्मचारी थे, राज्य की सिविल सेवा के कर्मचारी नहीं। उनके लिए 1976 के संबंधित सेवा नियमों में सेवानिवृत्ति लाभ के रूप में भविष्य निधि की व्यवस्था थी। बाद में भी पंचायत सेवा के 1999 के नियमों में पेंशन का कोई प्रावधान नहीं किया गया।
शासन ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता अंशदायी भविष्य निधि का लाभ ले चुके हैं। दूसरी ओर गुंडरदेही के तीन और तखतपुर के तीन कर्मचारियों को संबंधित जनपद पंचायतों की सामान्य प्रशासन समितियों के प्रस्ताव से स्थानीय निधि बनाकर पेंशन दी जा रही है। यह राज्य की किसी वैधानिक पेंशन योजना के तहत नहीं है। इस भुगतान के आधार पर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने 27 अगस्त और 31 अगस्त 2026 को संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए हैं।
सिर्फ सार्वजनिक कार्य करने से पंचायत कर्मी शासकीय सेवक नहीं बन जाता
हाई कोर्ट ने कहा कि जनपद पंचायतों के कर्मचारी शासकीय सेवक नहीं हैं। पंचायत संस्थाएं स्वायत्त निकाय हैं और उनके कर्मचारियों की सेवा अलग नियमों से संचालित होती है। केवल सार्वजनिक कार्य करने से कोई पंचायत कर्मचारी राज्य का शासकीय सेवक नहीं बन जाता।
अदालत ने यह भी कहा कि 1976 के पेंशन नियम सरकारी सिविल सेवा के कर्मचारियों पर लागू होते हैं और अंशदायी भविष्य निधि का लाभ लेने वाले कर्मचारी भी इन नियमों के दायरे से बाहर हैं।
दूसरे स्थान पर नियम के विपरीत मिल लहा लाभ कानूनी अधिकार नहीं बन जाता
याचिकाकर्ता यह बताने में भी असफल रहे कि किस वैधानिक प्रावधान के तहत उन्हें पेंशन का अधिकार प्राप्त है। गुंडरदेही और तखतपुर के कर्मचारियों को दी जा रही पेंशन पर कोर्ट ने कहा कि किसी दूसरे स्थान पर नियमों के विपरीत या विवादित तरीके से मिला लाभ दूसरे व्यक्ति के लिए कानूनी अधिकार नहीं बन सकता।
गलत लाभ के आधार पर समानता की मांग नहीं की जा सकती। जहां कानून किसी लाभ का अधिकार नहीं देता, वहां अदालत केवल उस लाभ को उचित मानकर सरकार को नई नीति या नियम बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। इन्हीं आधारों पर सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं।