
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। उत्तर प्रदेश के शामली स्थित घर से छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर अंबिकापुर लाए गए निश्चिंत वत्स की गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक हिरासत को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने 29 जून 2026 को उसे शामली से हिरासत में लेने के बाद न तो ट्रांजिट रिमांड लिया और न ही उसे दिल्ली की किसी सक्षम अदालत के समक्ष पेश किया। इसके बाद 30 जून को उसे दिल्ली से अंबिकापुर लाया गया और वहां मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर रिमांड लिया गया।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने 20 अगस्त को में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने नोटिस स्वीकार किया और जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा, जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया।
वारंट और गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हमीदा सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि निश्चिंत वत्स को 29 जून को शामली स्थित उसके घर से छत्तीसगढ़ पुलिस ने हिरासत में लिया। इस दौरान उसे कोई वारंट, नोटिस, समन, गिरफ्तारी मेमो या लिखित आदेश नहीं दिया गया। उसे एफआइआर, आरोपों या गिरफ्तारी के आधार की जानकारी भी नहीं दी गई।
याचिका के मुताबिक, पुलिस पहले उसे शामली कोतवाली और फिर नई दिल्ली स्थित छत्तीसगढ़ भवन ले गई। परिवार को बताया गया कि उसे द्वारका, दिल्ली की अदालत में पेश किया जाएगा, लेकिन उसे किसी दिल्ली की अदालत में पेश नहीं किया गया। अगले दिन 30 जून को उसे अंबिकापुर ले जाया गया।
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ट्रांजिट रिमांड नहीं लेने पर आपत्ति
याचिकाकर्ता पक्ष का मुख्य तर्क है कि एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाते समय पुलिस को सक्षम मजिस्ट्रेट से ट्रांजिट रिमांड लेना चाहिए था। ऐसा नहीं किया गया। याचिका में इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 187 में दिए गए कानूनी सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन बताया गया है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि 30 जून को अंबिकापुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा पारित रिमांड आदेश पहले से हुई कथित अवैध हिरासत की खामी को दूर नहीं कर सकता।
पहले के हाई कोर्ट फैसले का दिया हवाला
वरिष्ठ अधिवक्ता ने हाई कोर्ट के ही जितेश आनंद उर्फ जीतू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, याचिका में 3 अगस्त 2026 को दिए गए फैसले का हवाला दिया। दावा किया गया कि उस मामले में भी ट्रांजिट रिमांड और संविधान के अनुच्छेद 22(2) व बीएनएसएस की धारा 187 के अनुपालन के सवाल पर अदालत ने हिरासत की वैधता पर विचार किया था।
याचिका में इसी आधार पर 30 जून के रिमांड आदेश और उसके बाद की हिरासत को निरस्त कर तत्काल रिहाई की मांग की गई है।
सरकार को दो सप्ताह में जवाब देना होगा
हाई कोर्ट ने फिलहाल गिरफ्तारी या रिमांड को अवैध घोषित नहीं किया है। अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को जवाब पर प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है। इसके बाद मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।