छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पति पर झूठे केस और लगातार कानूनी लड़ाई को माना क्रूरता, तलाक मंजूर
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि पति और उसके परिवार के खिलाफ बार-बार झूठे आपराधिक मामल...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 06 Oct 2026 08:40:27 PM (IST)Updated Date: Tue, 06 Oct 2026 08:40:27 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद पर दिया बड़ा फैसला, सात साल पुराना बंधन समाप्त।
- कोरबा निवासी पत्नी मनीषा राठौर द्वारा दायर की गई सभी अपीलें और घरेलू हिंसा के मामले खारिज।
- सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने पारिवारिक अदालत का आदेश पलटा।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: हाई कोर्ट ने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा के मामले दर्ज कराने, आरोपितों के बरी होने के बाद भी उन फैसलों को चुनौती देने और लगातार कानूनी कार्यवाही जारी रखने को इस मामले की परिस्थितियों में मानसिक क्रूरता माना है।
जांजगीर निवासी विशंभर प्रसाद राठौर (29) की याचिका मंजूर करते हुए न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की युगलपीठ ने कोरबा निवासी पत्नी मनीषा राठौर (30) से उनका विवाह समाप्त करने का आदेश दिया है।
मामला वर्ष 2015 में हुए विवाह से जुड़ा है। पति का आरोप था कि शादी के बाद पत्नी कुछ दिन ही ससुराल में रही और उसके बाद व्यवहार को लेकर विवाद शुरू हो गया। पति ने पत्नी पर दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और घर में अशांति पैदा करने के आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। साथ ही मानसिक बीमारी की बात छिपाने का भी आरोप लगाया था। परिवार न्यायालय ने आठ अगस्त 2019 को आरोप साबित नहीं मानते हुए तलाक का आवेदन खारिज कर दिया था। अपील के दौरान पति ने बाद में हुए न्यायिक फैसलों को भी अभिलेख पर लिया।
पत्नी की शिकायत पर पति और उसके परिवार के छह अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला चला, जिसमें 14 दिसंबर 2023 को सभी सातों आरोपित बरी हो गए। पत्नी की ओर से की गई अपील भी सात मार्च 2025 को खारिज हो गई। घरेलू हिंसा कानून के तहत दायर आवेदन भी खारिज हुआ और उसकी अपील 23 अगस्त 2024 को निरस्त कर दी गई।
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हाई कोर्ट ने कहा कि केवल शिकायत दर्ज कराना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। वहीं जब शिकायत के बाद मुकदमा चले, पति और परिवार के सदस्य बरी हों और उसके बाद भी लगातार उन फैसलों को चुनौती देकर कानूनी कार्यवाही जारी रखी जाए, तो पूरे घटनाक्रम को वैवाहिक संबंधों की पृष्ठभूमि में देखा जाना जरूरी है।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के रानी नरसिम्हा शास्त्री और राकेश रमन के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में पत्नी की लगातार कानूनी कार्यवाही से पति को मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और तनाव हुआ। इसलिए यह आचरण मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
मानसिक बीमारी का आरोप साबित नहीं हुआ
हालांकि पति द्वारा पत्नी के मानसिक विकार के आधार पर तलाक मांगने का आधार हाई कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। डाक्टर ने बीमारी का इलाज संभव बताया था और यह भी कहा था कि उपचार के बाद पत्नी सामान्य वैवाहिक जीवन जी सकती है। \
बीमारी विवाह से पहले थी और इतनी गंभीर थी कि पति से साथ रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, इसका पर्याप्त प्रमाण भी नहीं मिला। पीठ ने अंततः परिवार न्यायालय का आठ अगस्त 2019 का फैसला रद करते हुए दो जून 2015 को हुआ विवाह समाप्त कर दिया।