
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। जमीन की बिक्री के पंजीयन में शासन को स्टांप शुल्क का नुकसान पहुंचाने और धोखाधड़ी व आपराधिक साजिश के आरोप में दोषी ठहराए गए तत्कालीन दुर्ग सब-रजिस्ट्रार आरके नेताम को हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
अपील लंबित रहने के दौरान 23 जुलाई 2022 को नेताम की मृत्यु हो चुकी थी। इसके बाद उनकी पत्नी सुनीता नेताम को अपील जारी रखने की अनुमति दी गई थी।
मामला 2006 में सामने आया था। गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में शिकायत कर आरोप लगाया था कि उनकी बहन आशा लता उर्फ आशा रानी की दुर्ग के पुलगांव में करीब 27.3 एकड़ जमीन थी। आरोप था कि निर्मला देवी अग्रवाल ने अमेरिका में तैयार कथित मुख्तारनामा के आधार पर जमीन की अलग-अलग बिक्री विलेख कराईं। तत्कालीन सब-रजिस्ट्रार आरके नेताम पर आरोप था कि आवश्यक स्टांप शुल्क जमा नहीं होने के बावजूद उन्होंने इन दस्तावेजों का पंजीयन कर दिया। इससे शासन को 6,08,115 रुपये के स्टांप शुल्क का नुकसान होने का आरोप लगाया गया।
साजिश और लेन-देन का प्रमाण नहीं मिला
मामले में नेताम पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 120-बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) व 13(2) के तहत आरोप लगाए गए थे। हाई कोर्ट ने पाया कि नेताम और निर्मला देवी अग्रवाल के बीच किसी पूर्व समझौते, बातचीत, धन के लेन-देन या किसी अनुचित लाभ पहुंचाने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। कई गवाह भी अभियोजन के आरोपों की पुष्टि नहीं कर सके।
जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि जमीन की मालिक और कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए गए। कथित मुख्तारनामा का मूल दस्तावेज भी जब्त नहीं किया गया था।
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दस्तावेज में चूक मात्र से भ्रष्टाचार का अपराध साबित नहीं
कोर्ट ने कहा कि पंजीयन के दौरान दस्तावेज की जांच में कथित चूक या प्रशासनिक लापरवाही को अतिरिक्त ठोस साक्ष्य के अभाव में भ्रष्टाचार का आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। केवल बिक्री विलेख का पंजीयन अपने आप में धोखाधड़ी या आपराधिक साजिश साबित नहीं करता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मजबूत संदेह भी सबूत का विकल्प नहीं हो सकता। पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर हाई कोर्ट ने नेताम की दोषसिद्धि और सजा रद्द करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। अपील में सुनीता नेताम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचबी अग्रवाल ने पैरवी की।