
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। हाई कोर्ट ने दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड में कार्यरत दिवंगत महिला कर्मचारी की अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े विवाद में अविवाहित बेटी को राहत देते हुए एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सौतेले बेटे द्वारा दायर रिट अपील खारिज कर दी।
मामला एसईसीएल कर्मचारी मंजू की वर्ष 2021 में सेवा के दौरान मृत्यु से जुड़ा है। उनकी मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए उनकी अविवाहित बेटी शकुंतला उर्फ शकुन और सौतेले बेटे शिवप्रसाद उर्फ शिवकुमार दोनों ने दावा प्रस्तुत किया था। दोनों पक्षों के बीच विवाद होने के कारण एसईसीएल ने एक-दूसरे से अनापत्ति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने को कहा था।
एनओसी नहीं मिलने पर दोनों के दावे नवंबर 2022 में खारिज कर दिए गए थे। इसके खिलाफ शकुंतला ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। एकलपीठ ने राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौता की धारा 9.3.3 का हवाला देते हुए माना था कि अविवाहित बेटी सीधे आश्रितों की श्रेणी में आती है और उसका दावा प्राथमिकता से विचार योग्य है। अदालत ने एसईसीएल को उसके आवेदन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था।
यह भी पढ़ें- CG High Court: अधिवक्ता की लगातार अनुपस्थिति पर भड़के जस्टिस,आरोपित को मिलेगा निःशुल्क सरकारी वकील
सौतेले भाई ने डिविजन बेंच में दी थी चुनौती
इस आदेश को शिवप्रसाद ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी। उनका तर्क था कि दोनों पक्षों के अधिकारों को लेकर उत्तराधिकार वाद लंबित है और बिना एनओसी के केवल बेटी के पक्ष में आदेश देना गलत है। खंडपीठ ने अपील खारिज करते हुए कहा कि एनसीडब्ल्यूडीए में आश्रितों की स्पष्ट श्रेणी निर्धारित है, जिसमें अविवाहित बेटी को विशेष स्थान दिया गया है। ऐसे में केवल एनओसी नहीं मिलने के आधार पर उसके दावे को खारिज करना नीति की भावना के विपरीत था।
अनुकंपा नियुक्त व उत्तराधिकारी अधिकार अलग-अलग
हाई कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति और उत्तराधिकार अधिकार अलग-अलग विषय हैं। उत्तराधिकार वाद लंबित होने से अनुकंपा नियुक्ति पर विचार नहीं रोका जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि एकलपीठ ने सीधे नौकरी देने का आदेश नहीं दिया, बल्कि अविवाहित बेटी के दावे पर नियमों के अनुसार पुनर्विचार करने को कहा था। आदेश में कोई कानूनी त्रुटि न पाकर रिट अपील खारिज कर दी गई।