मृत बहन की पहचान अपनाकर जमीन का दावा करना पड़ा महंगा, क्या 75 साल की महिला को जाना होगा जेल?
बालोद जिले में मृत बहन राधा बाई के नाम पर जमीन में हिस्सा मांगने के मामले में दोषी 75 वर्षीय गणेशिया बाई की दोषसिद्धि बिलासपुर हाईकोर्ट ने बरकरार रखी ...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 15 Oct 2026 09:59:46 PM (IST)Updated Date: Thu, 15 Oct 2026 09:59:46 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- मृत बहन के नाम पर जमीन का दावा करने पर दोषसिद्धि बरकरार।
- 35 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने दिखाई नरमी।
- 75 वर्षीय महिला की सजा 16 दिन भुगती अवधि तक सीमित।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुरः बालोद जिले में राजस्व प्रकरण के दौरान मृत बहन के नाम पर खुद को पेश कर जमीन में हिस्सा मांगने के मामले में दोषी ठहराई गई 75 वर्षीय गणेशिया बाई की दोषसिद्धि हाई कोर्ट ने बरकरार रखी है। हालांकि, घटना के करीब 35 साल बीतने और महिला की उम्र को देखते हुए कोर्ट ने उसकी सजा पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दी।
जस्टिस सुधीर कुमार ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि महिला को अब जेल जाने की जरूरत नहीं है। वह पहले ही कुल 16 दिन जेल में रह चुकी है। अभियोजन के अनुसार, गणेशिया बाई ने अपनी मां सुखबती की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति में नामांतरण और बंटवारे का दावा किया था। आरोप था कि वर्ष 1991-92 में नायब तहसीलदार, दौंडीलोहारा के समक्ष राजस्व प्रकरण की सुनवाई के दौरान उसने खुद को अपनी मृत बहन राधा बाई बताया, जबकि राधा बाई की जन्म के करीब 15 दिन बाद ही मृत्यु हो गई थी।
शिकायतकर्ता पोषण लाल ने आरोप लगाया था कि गणेशिया बाई ने मृत बहन की पहचान अपनाकर संपत्ति में हिस्सा पाने का प्रयास किया। जांच के दौरान जन्म और मृत्यु पंजी के अभिलेखों सहित अन्य दस्तावेज पेश किए गए। निचली अदालत ने 30 अप्रैल 2016 को उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 419 के तहत प्रतिरूपण और धारा 193 के तहत झूठे साक्ष्य देने का दोषी ठहराया। दोनों अपराधों में छह-छह महीने के सश्रम कारावास और 500-500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। अपील न्यायालय ने भी दोषसिद्धि बरकरार रखी थी।
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साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि कायम
हाई कोर्ट में महिला की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन ने मूल दस्तावेजों के बजाय छायाप्रतियों पर भरोसा किया और स्वतंत्र गवाहों की भी पर्याप्त जांच नहीं की। वैकल्पिक रूप से उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए सजा कम करने की मांग की गई। राज्य ने दोषसिद्धि को उचित बताया।
हाई कोर्ट ने जन्म-मृत्यु पंजी के अभिलेखों और राजस्व कार्यवाही से जुड़े साक्ष्यों पर विचार करते हुए कहा कि निचली अदालतों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का आधार नहीं है। हालांकि, घटना के करीब 35 साल बीतने और महिला की वर्तमान उम्र लगभग 75 वर्ष होने के कारण उसकी सजा पहले से भुगती गई अवधि यानी 16 दिन तक सीमित कर दी गई।
जमानत पर चल रही महिला को आत्मसमर्पण करने की जरूरत नहीं होगी। उसके जमानत बंधपत्र छह महीने तक प्रभावी रहेंगे।