
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: बिलासपुर नगर निगम की संपदा शाखा वर्षों से लिपिक लक्ष्मीकांत कोका की तानाशाही और मनमानी वसूली का सुरक्षित ठिकाना बनी हुई थी। बीडीए काल से उसी मलाईदार सीट पर लगातार जमे रहने के कारण उक्त सहायक ग्रेड-3 कर्मी के हौसले इतने बुलंद हो चुके थे कि वह खुद को विभाग प्रमुख से कम नहीं समझता था।
बिना उसकी सहमति के कोई भी फाइल आगे नहीं बढ़ती थी। बिलासपुर विकास प्राधिकरण के दौरान लक्ष्मीकांत कोका की नियुक्ति संपदा शाखा में हुई थी, तब से वह यहीं जमा हुआ था। संपदा शाखा सीधे तौर पर लीज नवीनीकरण, दुकान आवंटन, नाम ट्रांसफर और सरकारी जमीनों के नामांतरण जैसे मलाईदार मामलों से जुड़ी है।
कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि लिपिक ने दशकों तक एक ही सीट पर काबिज रहने के चलते वसूली का पूरा सिंडिकेट खड़ा कर लिया था। आम नागरिक हों या बड़े कारोबारी, महीनों चक्कर काटने के बाद भी काम तभी होता था जब तय नजराना चढ़ाया जाए। यदि किसी ने आपत्ति जताई, तो उसकी वैध फाइल में तकनीकी पेंच फंसा दिए जाते थे।
इस मनमानी पर तब विराम लगा जब राजकिशोर नगर निवासी अजीत शुक्ला से लीज नवीनीकरण के एवज में मांगी गई 10 हजार रुपये की रिश्वत लेते एसीबी की टीम ने उसे रंगे हाथ दबोच लिया। एसीबी की इस सख्त कार्रवाई और धारा 7 पीसी एक्ट के तहत केस दर्ज होने के बाद नगर निगम में हड़कंप मचा हुआ है।
संपदा शाखा में सबसे बड़ा खेल नगर निगम की दुकानों के नवीनीकरण और लीज रिन्यूअल की फाइलों में होता था। नियमों की आड़ लेकर आरोपित लक्ष्मीकांत कोका द्वारा फाइलों को महीनों तक आलमारी में दबा दिया जाता था। तय दर पर सुविधा शुल्क मिलते ही जो काम नामुमकिन बताया जाता था, वह कुछ ही घंटों में स्वीकृत हो जाता था।
लंबे समय तक संपदा शाखा में टिके रहने से लक्ष्मीकांत का प्रशासनिक रसूख इतना बढ़ गया था कि कई आयुक्त आए और गए, लेकिन कोई उसकी सीट नहीं बदल सका। इसी राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के दम पर वह खुद को शाखा प्रभारी मानकर अन्य कर्मचारियों और काम कराने आने वाले हितग्राहियों पर खुलेआम हुक्म चलाता था।
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