पुनर्गणना आदेश के बहाने नहीं टाल सकते मुआवजा, हाई कोर्ट ने NHAI को दी कानून का पालन करने की हिदायत
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने NHAI द्वारा अधिग्रहित जमीन के मुआवजे में वृद्धि को दोबारा चुनौती देने वाली मध्यस्थता अपील खारिज कर दी है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने स्पष्ट किया कि जब NHAI मूल मध्यस्थ आदेश के खिलाफ जिला न्यायालय में केस हार चुका था, तो उसी आदेश के तहत जारी पुनर्गणना को आधार बनाकर दोबारा हाई कोर्ट में चुनौती देने का नया वैधानिक अधिकार नहीं बनता।
Publish Date: Mon, 07 Sep 2026 03:28:00 PM (IST)Updated Date: Mon, 07 Sep 2026 03:28:00 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- मुआवजा वृद्धि पर NHAI की मध्यस्थता अपील हाई कोर्ट से खारिज।
- पुराने आदेश के अनुपालन में पुनर्गणना से नया अधिकार नहीं बनता।
- जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने दिया भूमि अधिग्रहण पर ऐतिहासिक फैसला।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुरः नेशनल हाईवे अथारिटी आफ इंडिया (एनएचएआइ) को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने कहा कि एनएचएआइ पहले ही मुआवजा बढ़ाने वाले मूल मध्यस्थ आदेश को जिला न्यायालय में चुनौती दे चुका था, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद, उसी आदेश के अनुपालन में भू-अर्जन प्राधिकारी द्वारा मुआवजे की पुनर्गणना कर अंतर राशि का भुगतान करने का आदेश जारी किया गया था। इस प्रक्रिया के माध्यम से मूल निर्धारण को दोबारा चुनौती देने का अधिकार नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने एनएचएआइ की धारा 37(1)(सी) के तहत दाखिल मध्यस्थता अपील को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने यह आदेश पारित किया। अपीलकर्ता एनएचएआइ, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, प्रोजेक्ट इंप्लीमेंटेशन यूनिट, रायपुर के माध्यम से है।
प्रतिवादी गुरविंदर सिंह अरोड़ा की जमीन के अधिग्रहण के संबंध में भू-अर्जन प्रकरण क्रमांक 29/ए-82/2007-08 में 12 अगस्त 2008 को मुआवजा निर्धारित किया गया था। असंतोष के चलते, उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत मध्यस्थता के समक्ष आर्बिट्रेशन केस प्रस्तुत किया। मध्यस्थ ने नौ फरवरी 2017 को मुआवजे की राशि को पुनर्गणना कर बढ़ाने का निर्देश दिया। इसके बाद, भू-अर्जन प्राधिकारी ने मुआवजे की राशि में वृद्धि करते हुए आदेश पारित किया।
एनएचएआइ ने इस आदेश को जिला न्यायालय में चुनौती दी, जिसे सात अप्रैल 2018 को खारिज कर दिया गया। हाई कोर्ट ने कहा कि यदि एनएचएआइ को नौ फरवरी 2017 के मध्यस्थ आदेश से आपत्ति थी, तो उसे जिला न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील करनी चाहिए थी।
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एनएचएआइ ने उस समय यह वैधानिक उपाय नहीं अपनाया। इसके बाद, एनएचएआइ ने मध्यस्थ के 16 जनवरी 2020 के आदेश के खिलाफ प्रधान जिला न्यायाधीश, रायपुर के समक्ष आर्बिट्रेशन केस दाखिल किया, जिसे 11 मार्च 2026 को खारिज कर दिया गया। एनएचएआइ ने फिर से हाई कोर्ट में अपील की।
तर्क नहीं आया काम
ए नएचएआइ के अधिवक्ता ने दलील दी कि पुनर्गणना आदेश को चुनौती दी जा सकती थी, जबकि राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता ने इसका विरोध किया। हाई कोर्ट ने कहा कि एनएचएआई ने पहले ही मूल आदेश को चुनौती दी थी, जिसे खारिज कर दिया गया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एनएचएआइ ने पुनर्गणना आदेश को चुनौती देकर मूल मुआवजा निर्धारण को दोबारा चुनौती देने का कोई नया कारण नहीं बनाया। इस आधार पर, हाई कोर्ट ने एनएचएआइ की अपील को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया।