डोंगरगढ़ रेलवे अंडरब्रिज विवाद: हनुमान मंदिर की जमीन के मुआवजे पर रोक से हाई कोर्ट का इन्कार
बिलासपुर हाई कोर्ट ने डोंगरगढ़ हनुमान मंदिर की जमीन के मुआवजा वितरण पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया। मंदिर प्रबंधन ने खसरा नंबर 1630-1631 की 3.35 एकड़ ...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 14 Oct 2026 09:44:39 PM (IST)Updated Date: Wed, 14 Oct 2026 09:44:39 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- मंदिर की जमीन के मुआवजे पर रोक से इन्कार।
- डोंगरगढ़ अंडरब्रिज निर्माण से जुड़ा है विवाद।
- मालिकाना हक का फैसला सिविल कोर्ट करेगा।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। डोंगरगढ़ स्थित हनुमान मंदिर की जमीन के मालिकाना हक को लेकर चल रहे विवाद में हाई कोर्ट ने मुआवजा वितरण पर रोक लगाने की मांग खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने आठ अक्टूबर 2026 को दिए आदेश में कहा कि जमीन के स्वामित्व, उसकी पहचान और पुराने दस्तावेजों से जुड़े विवादित तथ्यों का अंतिम निर्णय सिविल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होगा।
हाई कोर्ट ने अस्थायी निषेधाज्ञा देने से इन्कार करने वाले निचली अदालत और अपीलीय अदालत के आदेशों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया। हनुमान मंदिर की ओर से महंत सकेत बिहारी गुरु चेतनदास ने याचिका दायर की थी। उनका दावा था कि डोंगरगढ़ में खसरा नंबर 1630 और 1631 की कुल 3.35 एकड़ जमीन मंदिर की है।
याचिका के अनुसार, वर्ष 1957 में तत्कालीन महंत ने सक्षम न्यायालय की अनुमति के बिना जमीन का विक्रय कर दिया था, इसलिए उस सौदे से खरीदारों को वैध मालिकाना हक नहीं मिल सकता। मंदिर पक्ष ने राजस्व अभिलेखों में जमीन का रकबा घटाकर 2,180 वर्गफुट किए जाने पर भी आपत्ति जताई।
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मंदिर प्रबंधन को आशंका थी कि रेलवे अंडरब्रिज निर्माण के लिए अधिग्रहित की जा रही विवादित जमीन का मुआवजा ऐसे लोगों को दे दिया जाएगा, जिनका उस पर वैध अधिकार नहीं है। इसी आधार पर मुआवजा वितरण रोकने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा मांगी गई थी। राज्य की ओर से दलील दी गई कि निजी प्रतिवादी संबंधित जमीन पर अपने अधिकार का दावा वर्ष 2003 के पंजीकृत विक्रय पत्रों और वर्ष 2017 के दानपत्र के आधार पर कर रहे हैं।
राजस्व अभिलेखों में भी संबंधित भूखंड उनके नाम दर्ज हैं। राज्य ने यह भी कहा कि रेलवे अंडरब्रिज का निर्माण सार्वजनिक परियोजना के तहत कराया जा रहा है और रेलवे को इस प्रकरण में पक्षकार नहीं बनाया गया है।
अस्थायी रोक के लिए पर्याप्त आधार नहीं
हाई कोर्ट ने कहा कि मंदिर की जमीन, पुराने हस्तांतरण की वैधता और अलग-अलग खसरा नंबरों वाली जमीन की वास्तविक पहचान जैसे मुद्दे साक्ष्यों के आधार पर तय होने हैं। केवल पुराने हस्तांतरण को अवैध बताने से अस्थायी निषेधाज्ञा का अधिकार स्वतः नहीं बन जाता।
याचिकाकर्ता को यह भी दिखाना होगा कि वह मंदिर की ओर से मुकदमा लड़ने का अधिकार रखता है और रोक नहीं लगने से ऐसी अपूरणीय क्षति होगी, जिसकी भरपाई कानून के उपलब्ध उपायों से संभव नहीं है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि राजस्व अभिलेख अपने आप में मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, लेकिन मौजूदा स्तर पर विवादित दावों के आधार पर सार्वजनिक निर्माण कार्य रोकने का औचित्य भी नहीं बनता। निचली अदालतों के आदेशों में कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि या मनमानी नहीं पाए जाने पर हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। जमीन के अंतिम मालिकाना हक का विवाद इससे तय नहीं हुआ है।