
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। खराब खाद्यान्न की बिक्री के लिए जारी निविदा में रायपुर की सूरज बेसन एंड राइस मिल से भारतीय खाद्य निगम द्वारा की गई कटौतियों को हाई कोर्ट ने गलत माना है। न्यायमूर्ति सुषमा सावंत ने निगम की अपील पर मूल राशि 2,46,960 रुपये की वसूली का निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा।
कोर्ट ने पाया कि निविदा में वाणिज्यिक कर काटने का प्रावधान नहीं था और निगम के अधिकारी ने माना कि काटी गई कर राशि संबंधित विभाग में जमा भी नहीं की गई। माल की पूरी मात्रा समय पर उपलब्ध नहीं कराने के कारण देरी का ठीकरा भी निगम पर ही आया। हालांकि हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दिए गए 12 प्रतिशत ब्याज को घटाकर 6 प्रतिशत वार्षिक कर दिया।
भारतीय खाद्य निगम ने अगस्त 1998 में रायपुर के विभिन्न भंडारगृहों में खराब खाद्यान्न बेचने के लिए निविदा जारी की थी। सूरज बेसन एंड राइस मिल की निविदा 11,415 क्विंटल खराब खाद्यान्न के लिए 65,38,110 रुपये में स्वीकार हुई। मिल ने जनवरी 1999 में तीन किस्तों में पूरी राशि जमा कर दी।
बाद में निगम ने बिलों से वाणिज्यिक कर और माल समय पर नहीं उठाने के नाम पर कुछ रकम काट ली। मिल के अनुसार कर गलत तरीके से काटा गया और उसे वापस नहीं किया गया। साथ ही उसे जितनी मात्रा के लिए भुगतान करना पड़ा, उतना माल उपलब्ध भी नहीं कराया गया।
मिल ने बकाया रकम की वसूली के लिए सिविल मामला दायर किया। निचली अदालत ने 29 अप्रैल 2009 को मिल के पक्ष में फैसला देते हुए 2,46,960 रुपये और 12 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ निगम ने अपील की।
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एफसीआई ने कहा- निविदा की शर्त के अनुसार कटौती
निगम की ओर से कहा गया कि निविदा की शर्तों में विलंब से भुगतान पर दंडात्मक ब्याज और समय पर माल नहीं उठाने पर भंडारण शुल्क लगाने का अधिकार था। माल उठाने में देरी के कारण की गई कटौती भी अनुबंध के अनुसार थी। निगम ने ब्याज को भी अधिक बताया।
मिल की ओर से कहा गया कि बिलों से की गई कटौतियां निविदा की शर्तों के अनुरूप नहीं थीं और निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सही रकम दिलाई है।
कोर्ट ने क्यों माना कटौती गलत?
हाई कोर्ट ने निगम की अधिकारी लेखा चटर्जी की जिरह को महत्वपूर्ण माना। उन्होंने स्वीकार किया कि स्वीकार की गई निविदा में वाणिज्यिक कर काटने का कोई प्रावधान नहीं था। उन्होंने यह भी माना कि काटी गई कर राशि वाणिज्यिक कर विभाग में जमा नहीं की गई।
कोर्ट ने कहा कि इससे स्पष्ट है कि वह राशि वैध रूप से काटे जाने योग्य नहीं थी। माल उठाने में देरी के आरोप पर भी निगम के अधिकारी ने माना कि निर्धारित मात्रा का माल निगम स्वयं मिल को उपलब्ध नहीं करा सका। ऐसे में देरी के लिए मिल पर दंड शुल्क लगाना उचित नहीं था।
हालांकि ब्याज के मामले में हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में संशोधन किया। कोर्ट ने कहा कि अधिक ब्याज देने के लिए कोई संविदात्मक या कानूनी आधार नहीं है। इसलिए 2,46,960 रुपये की मूल राशि पर 27 मार्च 2002 से भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलेगा। इस तरह निगम की अपील आंशिक रूप से स्वीकार हुई।