22 साल से संतान का इंतजार कर रहे दंपती को हाईकोर्ट से राहत, पति की उम्र 55 से ज्यादा होने पर भी IVF की मंजूरी
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 22 साल से संतान की प्रतीक्षा कर रहे दंपती को टेस्ट ट्यूब उपचार की अनुमति दी। कोर्ट ने पति की उम्र को पत्नी के उपचार में बाधा मा...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 07 Oct 2026 02:21:27 PM (IST)Updated Date: Wed, 07 Oct 2026 02:21:27 PM (IST)
22 साल से संतान का इंतजार कर रहे दंपती को हाईकोर्ट से राहत। (फाइल फोटो)HighLights
- मनेंद्रगढ़ के दंपती 22 वर्षों से संतान की प्रतीक्षा कर रहे थे।
- पति की 57 वर्ष उम्र के कारण आवेदन खारिज हुआ।
- हाई कोर्ट ने पत्नी को उपचार के लिए पात्र माना।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। 22 साल से संतान का इंतजार कर रहे मनेंद्रगढ़ निवासी दंपती को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बड़ी राहत दी है। पत्नी की उम्र करीब 47 वर्ष और पति की 57 वर्ष होने के कारण सहायक प्रजनन तकनीक से उपचार की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने इस आदेश को रद करते हुए दंपती को टेस्ट ट्यूब पद्धति से उपचार कराने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि कानून में महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमा है, लेकिन एक पति की आयु सीमा पार होने से उम्र के लिहाज से पात्र पत्नी अपने उपचार के अधिकार से स्वतः वंचित नहीं हो जाती।
पति की उम्र अधिक होने के कारण खारिज हुआ था आवेदन
- मनेंद्रगढ़ के सिविल लाइंस निवासी अर्चना तिवारी और उनके पति प्रदीप कुमार तिवारी ने 31 जुलाई 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। अर्चना ने पहले 2013 में गर्भधारण के लिए अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान उपचार कराया था। 2015 में वह गर्भवती हुईं, लेकिन करीब चार महीने में गर्भपात हो गया। इसके बाद दंपती ने रायपुर के आयुष टेस्ट ट्यूब केंद्र से उपचार के लिए संपर्क किया।
- चिकित्सकीय जांच और परामर्श के बाद केंद्र ने उन्हें उपचार के लिए उपयुक्त पाया था। दंपती ने 24 जून को सक्षम प्राधिकारी से अनुमति मांगी, लेकिन 31 जुलाई को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया गया कि पति की उम्र 57 वर्ष है, जबकि संबंधित कानून में पुरुष के लिए ऊपरी आयु सीमा 55 वर्ष है।
प्रजनन संबंधी निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार
- दंपती की ओर से अधिवक्ता गगन तिवारी ने तर्क दिया कि कानून महिला के लिए 50 वर्ष और पुरुष के लिए 55 वर्ष की अलग-अलग आयु सीमा तय करता है। इसमें पति-पत्नी की संयुक्त आयु की कोई सीमा नहीं है। इसलिए पति की उम्र अधिक होने के आधार पर 47 वर्षीय पत्नी को उपचार से वंचित नहीं किया जा सकता।
- उन्होंने प्रजनन संबंधी निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा अधिकार बताया। राज्य की ओर से अधिवक्ता अनमोल शर्मा ने इसका विरोध करते हुए कहा कि 55 वर्ष की सीमा कानून में स्पष्ट है और अदालत व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर इसमें छूट नहीं दे सकती।
कोर्ट ने कहा- कानून में दंपती की संयुक्त आयु की सीमा नहीं
- उच्च न्यायालय ने कहा कि संबंधित कानून महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमा तय करता है। इसमें पति-पत्नी की संयुक्त आयु के आधार पर कोई रोक नहीं है। कानून में ऐसी शर्त जोड़ना, जो विधायिका ने स्पष्ट रूप से नहीं रखी है, उचित नहीं होगा।
- कोर्ट ने यह भी माना कि अर्चना चिकित्सकीय रूप से उपचार के लिए उपयुक्त पाई गई हैं और पति की उम्र के अलावा उपचार रोकने का कोई चिकित्सकीय कारण सामने नहीं आया। प्रजनन संबंधी निर्णय व्यक्ति की निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उपचार के दौरान 50 साल की उम्र भी बाधा नहीं
- कोर्ट ने 31 जुलाई का आदेश रद्द करते हुए दंपती को सभी चिकित्सकीय, नैतिक और वैधानिक शर्तें पूरी करने पर उपचार जारी रखने की अनुमति दी है। पति की 55 वर्ष से अधिक उम्र को पत्नी के उपचार में अपने आप बाधा नहीं माना जाएगा। खास तौर पर कोर्ट ने कहा कि यदि इस आदेश के बाद शुरू उपचार के दौरान अर्चना 50 वर्ष की हो जाती हैं, तो केवल उम्र बढ़ जाने के आधार पर चल रही उपचार प्रक्रिया बंद नहीं की जाएगी।
- हालांकि उपचार चिकित्सकीय रूप से उचित होना और अन्य सभी वैधानिक शर्तों का पालन जरूरी रहेगा। कोर्ट ने उपचार करने वाले केंद्र को भी सुरक्षा दी है कि आदेश के अनुपालन में उपचार करने पर केवल पति की उम्र के कारण उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
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