
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी)-2022 में 89.907 अंक पाने वाली मुंगेली की गरिमा को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। युवती ने 90 अंक की अनिवार्य पात्रता पूरी करने के लिए अपने अंकों को पूर्णांक में बदलने और एक विवादित प्रश्न का एक अंक देने की मांग की थी। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि परीक्षा योजना में अंकों को पूर्णांक करने का कोई प्रावधान नहीं है। केवल मामूली अंतर होने से निर्धारित न्यूनतम अर्हता में छूट नहीं दी जा सकती।
मुंगेली जिले के ग्राम सेमरसल निवासी गरिमा ने वर्ष 2022 में आयोजित टीईटी में हिस्सा लिया था। सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए 150 में से 90 अंक यानी 60 प्रतिशत अंक अनिवार्य थे, जबकि उसे 89.907 अंक मिले थे। इस कारण वह निर्धारित पात्रता से पीछे रह गई।
विवाद प्रश्न क्रमांक 145 को लेकर था। इसमें पूछा गया था कि दुनिया का पहला व्यावसायिक कंप्यूटर कौन सा था। विकल्पों में मैनियाक, एनियाक, यूनीवैक और एडसैक शामिल थे। व्यापमं की प्रारंभिक उत्तर कुंजी में विकल्प ‘सी’ यूनीवैक को सही बताया गया था, लेकिन अंतिम उत्तर कुंजी में इसे बदलकर विकल्प ‘बी’ एनियाक को सही घोषित कर दिया गया।
गरिमा ने यूनीवैक विकल्प चुना था, इसलिए उसे एक अंक नहीं मिला। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सीबीएसई की पाठ्यपुस्तक, इग्नू की अध्ययन सामग्री और अन्य संदर्भ पुस्तकों में यूनीवैक को पहला व्यावसायिक अथवा व्यावसायिक रूप से सफल कंप्यूटर बताया गया है। उसने अंतिम उत्तर कुंजी में बदलाव को गलत बताते हुए एक अंक देने और परिणाम दोबारा घोषित करने की मांग की। साथ ही 89.907 अंक को राउंड ऑफ कर 90 मानने का आग्रह किया।
व्यापमं की ओर से तर्क दिया गया कि अंतिम उत्तर कुंजी आपत्तियों पर विचार और विषय विशेषज्ञों की राय के बाद जारी की गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अंकों का वास्तविक मूल्य ही माना जाना चाहिए। राउंड ऑफ करने से अलग-अलग अंक पाने वाले अभ्यर्थियों की समान स्थिति बन सकती है।
हाई कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक और प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तरों की शुद्धता तय करना विषय विशेषज्ञों का काम है। अदालत सामान्यतः विशेषज्ञों के निर्णय की जगह अपना आकलन नहीं रख सकती। प्रारंभिक उत्तर कुंजी में यूनीवैक को सही बताने मात्र से अभ्यर्थी को उसे अंतिम उत्तर कुंजी में बनाए रखने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत को अंतिम उत्तर कुंजी में ऐसी स्पष्ट और प्रत्यक्ष गलती नहीं मिली, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जा सके।
गरिमा ने एक अन्य मामले में 59.7 प्रतिशत को 60 प्रतिशत मानकर प्रवेश देने के हाई कोर्ट के आदेश का हवाला दिया था। कोर्ट ने कहा कि वह आदेश नाबालिग बच्चे के प्रवेश से जुड़े विशेष तथ्यों में दिया गया था। उसे हर प्रतियोगी परीक्षा में राउंड ऑफ लागू करने का सामान्य नियम नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका खारिज होने से गरिमा भविष्य की उन परीक्षाओं या चयन प्रक्रियाओं में भाग लेने से वंचित नहीं होगी, जिनके लिए वह नियमों के अनुसार पात्र होगी।
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