
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। रबी फसल में धान उगाने की होड़ अब ग्रामीण क्षेत्रों में गर्मी के दिनों में पानी की भीषण समस्या पैदा करने लगी है। रबी फसल से घटते जल स्तर को लेकर कृषि विभाग ने जब सिंचाई के लिए इस्तेमाल हो रहे भू-जल के सर्वे का आकलन किया तो बेहद चौंकाने वाले ग्राफ सामने आ रहे हैं।
जिले में बीते 25 सालों में जल स्तर 200 से 400 फीट तक नीचे खिसक गया है। कई इलाकों में स्थिति इतनी भयावह है कि 500 फीट गहरा बोर खनन कराने के बाद भी पानी की एक बूंद नसीब नहीं हो रही है।
अधिकारियों की मानें तो प्रति परिवार अपनी माह भर की निस्तारी (नहाने-धोने व खाना बनाने) के लिए जितने पानी की आवश्यकता होती है, उससे दो से ढाई गुना ज्यादा पानी महज एक से दो हेक्टेयर में बोई गई रबी धान की फसल पी रही है।
थोड़े से लाभ के चक्कर में कुछ किसान अपने साथ-साथ पूरे गांव का पानी सुखा रहे हैं। प्रशासन अब इसे लेकर गांव-गांव कैंप लगाकर जागरूकता अभियान चला रहा है, ताकि लोग समझ सकें कि यह रबी फसल में बोया गया धान भविष्य में उन्हें व उनके पूरे गांव को प्यासा रखने या पानी के लिए दर-दर भटकने का कारण बन सकता है।

अधिकारियों के अनुसार उनके कराए गए सर्वे में तखतपुर ब्लाक के बीजा, दैजा, बेलपान और बिल्हा ब्लाक के बिल्हा, पौंसरा, गढ़वट वही दक्षिण बिल्हा के कई गांवो में स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाती है। वहीं मस्तूरी और सीपत क्षेत्र के कई गांवों में पानी का स्तर इतना नीचे चला जाता है कि भीषण गर्मी के दौरान लोगों को पानी के लिए काफी परेशान होना पड़ता है। इसका कारण इन गांवों में भू-जल का दोहन क्षमता से कहीं अधिक हो रहा है, जिससे आने वाले दिनों में पेयजल संकट खड़ा होने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
अधिकारियों के अनुसार एक परिवार दिनभर में 2000 से 3000 लीटर पानी में अपना गुजारा कर लेता है, वहीं धान की खेती में लाखों लीटर पानी बिना किसी रोक-टोक के जमीन से निकाला जा रहा है। 500 फीट की गहराई तक पानी नहीं मिलने का एकमात्र कारण रबी सीजन में धान की फसल का बढ़ता रकबा है। विभाग अब कम पानी वाली फसलों (दलहन-तिलहन) को अपनाने पर जोर दे रहा है। विभाग का दावा है इस बार तीन हजार हेक्टेयर से अधिक का रकबा कम हुआ है।