
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षक भर्ती के आरक्षण रोस्टर को लेकर चल रहे विवाद में हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ के समक्ष स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से चार मई 2023 को जारी भर्ती विज्ञापन में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए निर्धारित आरक्षण और रद्द की जा चुकी आरक्षण नीति के आधार पर रोस्टर लागू करने का मुद्दा उठा।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ने 58 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित उस व्यवस्था के आधार पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई, जिसे हाई कोर्ट की पीठ पहले ही निरस्त कर चुकी थी।
याचिकाकर्ताओं के प्रस्तुत विवरण के अनुसार, अदालत ने विवादित आरक्षण व्यवस्था को निरस्त करते हुए पहले से नियुक्त शिक्षकों को तत्काल सेवा से हटाने का निर्देश नहीं दिया। हालांकि, वर्तमान और भविष्य की नियुक्तियों तथा पदोन्नतियों को सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन रखने की बात कही गई है। इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भर्ती प्रक्रिया में प्रशासनिक निरंतरता और आरक्षण की संवैधानिक वैधता के प्रश्न को अलग-अलग देखा गया है।
आदेश के सटीक दायरे की पुष्टि मूल न्यायादेश से किया जाना आवश्यक है। स्कूल शिक्षा विभाग और व्यापमं ने चार मई 2023 को सहायक शिक्षक, शिक्षक और व्याख्याता के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। कामेश्वर कुमार यादव, योगेंद्र कुमार शर्मा, परिमल कुमार भोई और अन्य याचिकाकर्ताओं ने भर्ती में लागू आरक्षण रोस्टर को चुनौती दी। इन याचिकाओं में डब्ल्यूपीएस क्रमांक 300/2024 को प्रमुख मामला बताया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नौशीना आफरीन अली और अन्य अधिवक्ताओं ने दलील दी कि शिक्षक के ई-कैडर के 1,113 पदों में से 698 पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित किए गए थे। यह कुल पदों का लगभग 62.71 प्रतिशत था। इसी तरह टी-कैडर के 4,659 पदों में से 3,105 पद एसटी वर्ग के लिए आरक्षित होने का दावा किया गया, जो करीब 66.64 प्रतिशत है।
सहायक शिक्षक के पदों में भी आरक्षण का अनुपात 56.62 से 68.42 प्रतिशत तक बताया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आरक्षण की ऐसी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। उन्होंने भर्ती विज्ञापन में लागू रोस्टर को निरस्त कर वैध आरक्षण नियमों के अनुसार दस्तावेज सत्यापन, काउंसलिंग और नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी करने की मांग की।
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2012 की अधिसूचना को लेकर उठा विवाद
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि 29 नवंबर 2012 की अधिसूचना के जरिए राज्य में आरक्षण का कुल अनुपात बढ़ाकर 58 प्रतिशत किया गया था। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 19 सितंबर 2022 को इस व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया था। इसके बावजूद उसी नीति और उससे जुड़े रोस्टर के आधार पर नया भर्ती विज्ञापन जारी किए जाने पर उन्होंने सवाल उठाया।
उनकी दलील थी कि जब मूल अधिसूचना ही निरस्त हो चुकी थी, तब उसके आधार पर तैयार रोस्टर को नई भर्ती में लागू नहीं किया जा सकता। बैकलॉग पदों को शामिल करने के नाम पर दूसरे वर्गों के लिए निर्धारित अवसरों को प्रभावित करना भी उचित नहीं है।
शासन ने बैकलॉग पदों और क्षेत्रीय रोस्टर का दिया हवाला
राज्य शासन की ओर से उप महाधिवक्ता आनंद दादरिया ने दलील दी कि भर्ती विज्ञापन में नए पदों के साथ वर्ष 2019 की भर्ती के लगभग 3,190 बैकलॉग पद भी शामिल थे। शासन के अनुसार, सहायक शिक्षक और शिक्षक के पदों की प्रकृति अलग-अलग होने के कारण जिला और संभाग स्तर पर रोस्टर लागू किया गया। बस्तर और सरगुजा संभाग की स्थानीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा गया।
शासन ने यह भी बताया कि वर्ष 2022 के हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। वहां लंबित विशेष अनुमति याचिकाओं में एक मई 2023 को अंतरिम आदेश पारित हुआ था, जिसके आधार पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति मिलने का तर्क दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक नियुक्तियों पर रहेगी शर्त
याचिकाकर्ताओं के विवरण के अनुसार, अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित होने मात्र से पहले निरस्त की जा चुकी आरक्षण व्यवस्था के आधार पर भर्ती जारी रखी जा सकती है। विवादित रोस्टर को निरस्त करने के साथ नियुक्तियों और पदोन्नतियों को सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रखने का निर्देश भी बताया गया है।
यानी नियुक्ति या पदोन्नति मिलने मात्र से संबंधित अभ्यर्थी को सेवा, वरिष्ठता अथवा पद पर बने रहने का ऐसा अंतिम अधिकार नहीं मिल जाएगा, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से अप्रभावित हो। यदि अंतिम फैसले के बाद रोस्टर, चयन सूची या नियुक्तियों में बदलाव जरूरी होता है, तो राज्य शासन को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करनी होगी।