
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने औद्योगिक इकाइयों द्वारा अपने परिसर में बोरवेल के माध्यम से भूजल निकालने पर राज्य सरकार द्वारा लगाए गए जल शुल्क को वैध ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक स्रोत से निकाले गए भूजल पर भी छत्तीसगढ़ सिंचाई अधिनियम, 1931 और सिंचाई नियम, 1974 के तहत जल शुल्क लगाया जा सकता है। सीजीडब्ल्यूए (केंद्रीय भूजल प्राधिकरण) की एनओसी मिलने से उद्योग को राज्य के जल शुल्क से छूट नहीं मिलती।
जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने जेके लक्ष्मी सीमेंट की ओर से दायर दो याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। दोनों याचिकाओं में कंपनी ने भूजल के उपयोग पर लगाए गए 38 लाख 57 हजार 459 रुपये और 61 लाख 58 हजार 707 रुपये के जल शुल्क की मांग को चुनौती दी थी।
कंपनी के परिसर में सात बोरवेल हैं। कंपनी ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से एनओसी प्राप्त कर रखी थी। उसका तर्क था कि वह भूजल अपने स्तर पर निकाल रही है, राज्य सरकार ने उसे पानी की आपूर्ति नहीं की है। इसलिए सिंचाई अधिनियम की धारा 37 और 40 के तहत जल शुल्क नहीं लगाया जा सकता।
कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि भूजल के नियमन के लिए केंद्रीय पर्यावरण कानून लागू है और सीजीडब्ल्यूए की एनओसी होने के कारण राज्य सरकार अलग से शुल्क नहीं लगा सकती।
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हाई कोर्ट ने कहा- कानून में शुल्क लगाने का स्पष्ट आधार
हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 17 राज्य को जल और जल आपूर्ति के संबंध में कानून बनाने का अधिकार देती है। छत्तीसगढ़ सिंचाई अधिनियम, 1931 और उसके तहत बनाए गए 1974 के नियम इसी विधायी अधिकार के तहत बनाए गए हैं। कोर्ट ने विशेष रूप से नियम 71-ए का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें उद्योगों द्वारा "प्राकृतिक/स्वयं के स्रोत" से उपयोग किए जाने वाले पानी के लिए भी अलग दर निर्धारित है। बोरवेल से निकाला गया भूजल इसी श्रेणी में आता है।
राज्य पानी पहुंचाए तभी शुल्क लगेगा, यह तर्क खारिज
कोर्ट ने कंपनी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि राज्य ने उसके परिसर तक पानी पहुंचाया ही नहीं, इसलिए इसे ''''जल आपूर्ति'''' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि धारा 40 को केवल नहर से पानी की भौतिक आपूर्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता। राज्य के क्षेत्र में प्राकृतिक जल संसाधनों से पानी निकालने और उसका उपयोग करने की अनुमति भी इसके नियामक दायरे में आती है। फैसले में कहा गया कि राज्य द्वारा पानी पाइप या नहर के जरिए उद्योग तक पहुंचाना जरूरी नहीं है। अपने बोरवेल से प्राकृतिक जल निकालने पर भी निर्धारित शुल्क लागू हो सकता है।
सीजीडब्ल्यूए की एनओसी को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाई कोर्ट ने कहा कि सीजीडब्ल्यूए की एनओसी भूजल के पर्यावरणीय और संरक्षण संबंधी नियमन से जुड़ी है। एनओसी से कंपनी को भूजल पर मालिकाना हक नहीं मिलता और न ही वह राज्य के कानून के तहत निर्धारित जल शुल्क से मुक्त होती है। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि कंपनी को सात बोरवेल से प्रतिदिन करीब 3.20 लाख लीटर पानी निकालने की अनुमति थी।
कंपनी ने पानी का उपयोग केवल घरेलू, पेयजल और ग्रीन बेल्ट के लिए होने का दावा किया, लेकिन कोर्ट के अनुसार इस दावे के समर्थन में पर्याप्त समकालीन रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए गए। कंपनी ने दोनों याचिकाओं में पानी के वास्तविक उपयोग को लेकर अलग-अलग रुख भी अपनाया था।
एसीसी मामले का फैसला बना अहम आधार
हाई कोर्ट ने एसीसी लिमिटेड बनाम छत्तीसगढ़ शासन मामले में अपने पूर्व के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के 11 जनवरी 2022 के निर्णय का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक या स्वयं के स्रोत से औद्योगिक उपयोग के लिए पानी निकालने पर जल शुल्क लागू होने का कानूनी प्रश्न पहले ही न्यायिक रूप से तय हो चुका है।
कंपनी ने यह भी दावा किया था कि राज्य ने आरटीआई के जवाब में बताया है कि अन्य उद्योगों के साथ भूजल निकासी का कोई समझौता नहीं किया गया है, इसलिए उसे ही निशाना बनाया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि अन्य मामलों में कानून लागू नहीं किए जाने से किसी व्यक्ति या उद्योग को कानून के पालन से छूट का अधिकार नहीं मिल जाता।
दोनों मांगों को वैध ठहराया
कोर्ट ने 6 जून 2019, 18 जुलाई 2019 और 14 फरवरी 2020 के मांग नोटिसों को वैधानिक अधिकार के तहत जारी माना। 2019 में कंपनी पर 38.57 लाख रुपये और बाद में संशोधित दरों के आधार पर 61.58 लाख रुपये की मांग की गई थी। हाई कोर्ट ने दोनों याचिकाओं को गुणहीन बताते हुए खारिज कर दिया और कंपनी को संबंधित मांग का पालन करने का निर्देश दिया। मामले में कोई लागत नहीं लगाई गई।