
नईदुनिया प्रतिनिधि,बिलासपुर। नवम् जिला न्यायाधीश अगम कुमार कश्यप की अदालत ने एक अधिवक्ता द्वारा अपने ही पूर्व मुवक्किलों के खिलाफ बकाया फीस वसूली के लिए दायर व्यवहार अपील को पूरी तरह सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया है। जिला न्यायालय ने द्वितीय व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2 कोटा द्वारा पूर्व में पारित फैसले की पुष्टि करते हुए तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अधिवक्ता स्वयं यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहे कि उनकी फीस वास्तव में बकाया थी। इसके विपरीत, खुद उनके और उनके गवाहों के बयानों में ऐसे गंभीर विरोधाभास पाए गए, जिसने पूरे मामले की विश्वसनीयता को ही खत्म कर दिया।
मामले के अनुसार, रतनपुर निवासी अधिवक्ता रामेश्वर कश्यप ने अपने पूर्व पक्षकारों बाबू लाल गोंड और समारु राम साहू के खिलाफ 30000 रुपये की वकालत फीस बकाया होने का दावा करते हुए सिविल सूट दायर किया था। अधिवक्ता का दावा था कि उन्होंने व्यवहार न्यायालय कोटा, कमिश्नर न्यायालय बिलासपुर और नायब तहसीलदार रतनपुर के समक्ष इन पक्षकारों के विभिन्न राजस्व व दीवानी मामलों में पूरी पैरवी की थी।
विवाद तब शुरू हुआ जब मुवक्किलों ने अपनी फाइलें वापस मांगी। अधिवक्ता ने फाइल लौटाने के एवज में 30000 रुपये के बकाये का दावा ठोक दिया। अधिवक्ता के अनुसार, पक्षकारों ने जल्द भुगतान का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में मुकर गए। इसके बाद उन्होंने कोर्ट की शरण ली, लेकिन कोटा कोर्ट ने 22 मार्च 2022 को उनके दावे को खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ उन्होंने जिला अदालत में अपील की थी।
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जिरह में खुली पोल: 16,000 मिलना पहले ही किया स्वीकार
अपील की अंतिम सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अधिवक्ता रामेश्वर कश्यप ने अपने दावों में खुद ही विरोधाभासी जाल बुन लिया। एक तरफ जहां उन्होंने 30,000 की कुल बकाया राशि की वसूली का मुख्य मुकदमा लगाया, वहीं दूसरी ओर विपक्षी वकील द्वारा किए गए प्रतिपरीक्षण में उन्होंने खुद यह स्वीकार कर लिया कि उन्हें पक्षकार बाबूलाल से 5,000 और समारु राम से 11,000 रुपये की फीस पहले ही प्राप्त हो चुकी थी।
मैखिक दावे संदेहास्पद, यह टिकने योग्य नहीं- काेर्ट
कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने माना कि जब दोनों पक्षों के बीच फीस तय होने का कोई लिखित विधिक अनुबंध नहीं था और अधिवक्ता खुद ही 16,000 मिलना स्वीकार कर रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में 30000 अतिरिक्त बकाया होने का उनका केवल मौखिक दावा पूरी तरह संदेहास्पद और कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं रह जाता।
इन तीन मुख्य विधिक आधारों पर खारिज की अपील
1. मुख्य गवाह के बयान से केस ध्वस्त-अधिवक्ता के मुख्य गवाह रुद्र यादव ने जिरह में उनके दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। गवाह ने साफ कहा कि उसके सामने मुवक्किलों से फीस की कोई मांग या बात नहीं हुई थी। उसे तय फीस या बकाये की कोई जानकारी नहीं थी, जिससे वादी का पक्ष पूरी तरह ध्वस्त हो गया।
2. अपूर्ण पक्षकार -केस में अपूर्ण पक्षकार '''' की बड़ी कानूनी चूक सामने आई। मूल वकालतनामे के अनुसार मामले में रामेश्वर कश्यप के साथ दो अन्य वकील भी संयुक्त रूप से नियुक्त थे। मुख्य वाद में उनके अधिकारों पर चुप्पी साधी गई और अन्य संबंधित मुवक्किलों को भी पक्षकार नहीं बनाया गया।
3. बर्डन ऑफ प्रूफ का सिद्धांत- अदालत ने ओनस प्रोबेंडी सिद्धांत के तहत स्पष्ट किया कि दीवानी मामलों में अपने दावे को साबित करने की पूरी जिम्मेदारी वादी की होती है। वादी को पुख्ता दस्तावेजी सबूत पेश करने होते हैं। फीस का कोई लिखित अनुबंध या दस्तावेजी प्रमाण नहीं था, इसलिए मौखिक दावा खारिज हुआ।