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आरटीआई में देरी पर जुर्माना अनिवार्य नहीं; छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट, पढ़े पूरा क्या कहना है कोर्ट का

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सूचना का अधिकार (RTI) कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि आरटीआई में देरी होने पर अधिकारियों पर जुर्माना लगाना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कानून का मुख्य उद्देश्य आवेदक को जानकारी दिलाना है। महासमुंद जिले के एक मामले में याचिकाकर्ता ने अधिकारियों पर जुर्माना लगाने की मांग की थी।

By Manoj Kumar TiwariEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Sun, 21 Jun 2026 09:58:28 AM (IST)Updated Date: Sun, 21 Jun 2026 09:58:28 AM (IST)
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आरटीआई में देरी पर जुर्माना अनिवार्य नहीं; छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट, पढ़े पूरा क्या कहना है कोर्ट का
प्रतीकात्मक चित्र

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कानून का मूल उद्देश्य 'सूचना दिलाना' है।
  2. हाई कोर्ट ने कहा- दुर्भावना होने पर ही लगाया जाएगा अधिकारियों पर जुर्माना।
  3. महासमुंद के एक मामले में याचिकाकर्ता की अपील को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।

नईदुनिया प्रतिनिधि बिलासपुर। हाई कोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम से संबंधित एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। न्यायालय ने कहा है कि आरटीआई के तहत जानकारी देने में देरी होने पर लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाना स्वचालित या अनिवार्य नहीं है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने महासमुंद के आवेदक की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने राज्य सूचना आयोग द्वारा दोषी अधिकारियों पर जुर्माना न लगाने के फैसले को चुनौती दी थी।

कोर्ट ने माना कि आरटीआई कानून का प्राथमिक उद्देश्य ''''सूचना दिलाना'''' है, न कि अधिकारियों को दंडित करना। मामला महासमुंद जिले के वरिष्ठ नागरिक ललित चंद्रनाहू से जुड़ा है, जिन्होंने 12 अप्रैल 2018 को सहकारिता विभाग के तत्कालीन संयुक्त रजिस्ट्रार के समक्ष आरटीआई आवेदन दिया था। उन्होंने 2014 से 2017 के बीच ''''उर्वरक विकास कोष'''' के भुगतान से संबंधित दस्तावेज मांगे थे।


अधिकारियों ने गलत जानकारी प्रदान की, जिसके खिलाफ की गई प्रथम अपील खारिज हो गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया और अधिकारियों को 30 दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया।

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हालांकि, याचिकाकर्ता संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि अधिकारी समय पर जानकारी नहीं देते हैं, तो उन पर जुर्माना लगाना अनिवार्य है। लेकिन सूचना आयोग के अधिवक्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि जुर्माना केवल तब लगाया जाता है जब अधिकारी ने ''''दुर्भावना'''' से जानकारी रोकी हो।

अंततः, हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आयोग ने पहले ही जानकारी देने का आदेश दिया था, जिससे कानून का मूल उद्देश्य पूरा हो चुका है।

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