
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। बिलासपुर में चावल की महंगाई ने आम आदमी की थाली का हिसाब बिगाड़ दिया है। महीनेभर में कई किस्मों के भाव 15 से 20 रुपये किलो तक चढ़ने की जानकारी है। सामान्य उसना और खंडा चावल, जो पहले 35 रुपये किलो मिलते थे, अब 50 रुपये तक पहुंच गए हैं। दिलचस्प यह कि खुले बाजार में कीमतें चढ़ रही हैं, लेकिन कई ब्रांडेड कंपनियों के पैकबंद चावल के दाम फिलहाल स्थिर हैं।
चावल की कीमतों में तेजी के पीछे स्थानीय आपूर्ति से लेकर अंतरराष्ट्रीय कारोबार तक कई कारण सामने आ रहे हैं। पश्चिम एशिया में भारतीय चावल की मांग, निर्यात बाजार में बढ़ते भाव और दक्षिण भारत में कम बारिश से धान उत्पादन प्रभावित होने की आशंका ने बाजार पर दबाव बढ़ाया है। कर्नाटक में सूखे के कारण धान की बुआई का रकबा चार लाख हेक्टेयर से अधिक घटने की रिपोर्ट है। इससे वहां सोना मसूरी और कोलम जैसी किस्में भी महंगी हुई हैं।
इधर, छत्तीसगढ़ में पिछले खरीफ सीजन का धान समाप्त होने और नई फसल की आवक के इंतजार से बाजार की चिंता बढ़ी है। राज्य सरकार ने 15 नवंबर से 3,100 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर धान खरीदी शुरू करने का फैसला किया है। हालांकि, सरकारी समर्थन मूल्य और खुले बाजार में चावल के खुदरा भाव का सीधा संबंध नहीं है।
मिलिंग, परिवहन, गुणवत्ता और स्टाक की उपलब्धता भी कीमत तय करते हैं। बिलासपुर में बढ़ती लागत का असर होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर भी पड़ रहा है। संचालकों के सामने थाली की कीमत बढ़ाने या चावल की गुणवत्ता और किस्म बदलने का विकल्प है। दूसरी ओर, सरकारी राशन के चावल की निर्धारित दरें फिलहाल स्थिर हैं।
चावल की कीमत बढ़ने से होटल संचालकों के सामने लागत और गुणवत्ता का संतुलन बनाने की चुनौती है। कम कीमत वाली थाली में महंगा चावल इस्तेमाल करने से मुनाफा घटता है। दूसरी ओर, चावल की किस्म बदलने पर ग्राहक स्वाद और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा सकते हैं। चावल की खपत अधिक होने से छोटी वृद्धि भी महीने के खर्च में बड़ा अंतर पैदा करती है।
नीरज ट्रेडर्स व्यापार विहार के संचालक नीरज नागदेव कहते हैं कि थोक बाजार में खरीद महंगी होने का असर चिल्हर दुकानों तक पहुंचता है। हालांकि, सभी दुकानदारों के पास एक ही समय पर खरीदा गया स्टाक नहीं होता। इसलिए एक ही किस्म का भाव अलग-अलग दुकानों पर अलग मिल सकता है। पुराने स्टाक और नई खरीद के बिलों की तुलना से वास्तविक मूल्य वृद्धि समझी जा सकती है।
चावल की कीमतों में तेजी के बीच खाद्य विभाग और जिला प्रशासन की चूक स्पष्ट है। बाजार का उचित मूल्यांकन और स्थति को भांपने में नाकाम नजर हैं। तत्काल बाजार में स्टाक और बिक्री दरों की निगरानी करनी चाहिए। थोक विक्रेताओं के भंडार, खरीदी के बिल और चिल्हर कीमतों की जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि वृद्धि की वजह वास्तविक लागत है या कहीं कृत्रिम कमी पैदा की जा रही है। नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है।-
बाजार में चावल की उपलब्धता और स्टाक की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। दुकानदार किस्मवार भाव प्रदर्शित करें और ग्राहकों को पक्का बिल दें। खाद्य विभाग थोक और चिल्हर भाव की तुलना करे। जमाखोरी की शिकायतों की जांच की जाए। ग्राहक भी अलग-अलग दुकानों के भाव की तुलना कर सकते हैं। इससे वास्तविक कमी और अनावश्यक मूल्य वृद्धि के बीच अंतर स्पष्ट करने में मदद मिलेगी।
अशोक राइर्स मिलर्स अशोक जायसवाल का कहना है कि राइस मिलों में पुराने धान का स्टाक लगभग समाप्त होने से चावल का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने के बावजूद बाजार में पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही है। उपलब्धता और मांग के बीच बढ़ते अंतर का असर कीमतों पर भी पड़ रहा है।

सुरेंद्र होटल इंटरसिटी के संचालक सुरेंद्र छाबड़ा का कहना है कि चावल की कीमतों में अचानक आई तेजी ने होटल और रेस्टोरेंट का बजट बिगाड़ दिया है। रोजाना बड़ी मात्रा में चावल की खपत होती है, ऐसे में प्रति किलो 20 रुपये की बढ़ोतरी बड़ा झटका है। अब चिंता यह है कि चावल की गुणवत्ता से समझौता किए बिना बढ़ती लागत को कैसे संभालें।
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गीतागृहणी गीता मौर्य कहती हैं कि चावल का दाम बढ़ने के पीछे कहीं कालाबाजारी तो नहीं। क्योंकि कोविड के बाद से आए दिन ऐसी स्थितियां बन रही है। खाद्यान को लेकर लोग ऐसा कर मुनाफा कमाते हैं। सरकार को इन पर तत्काल लगाम लगाना चाहिए। क्योंकि छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है और कटोरे में चावल महंगा नहीं होना चाहिए।
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