अंतरजातीय विवाह के बाद सामाजिक बहिष्कार, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा- जांच अधिकारी स्वतंत्र रूप से करे जांच
अंतरजातीय विवाह के बाद सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रही अंकिता प्रधान की याचिका पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जांच अधिकारी पूरी तरह स्व...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 16 Sep 2026 08:45:16 PM (IST)Updated Date: Wed, 16 Sep 2026 08:45:16 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- दंतेवाड़ा के बचेली में रह रही अंकिता प्रधान ने दो मार्च को किया था अंतरजातीय विवाह।
- बसना थाने में दर्ज एफआईआर और सभी आरोपियों के नाम नहीं होने पर हुई सुनवाई।
- समुदाय के सामाजिक दर्जे और अधिकारों से वंचित करने के मामले में पुलिस की कार्रवाई।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: अंतरजातीय विवाह के बाद सामाजिक दर्जे और समुदाय से मिलने वाले अधिकारों से वंचित किए जाने की शिकायत लेकर हाई कोर्ट पहुंची महसमुंद जिले की अंकिता प्रधान की याचिका का डिवीजन बेंच ने निराकरण कर दिया है। कोर्ट ने जांच में सीधे तौर पर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने या कोई विशेष दिशा-निर्देश देने से इन्कार किया, लेकिन जांच अधिकारी को स्वतंत्र रूप से पूरी जांच करने और उपलब्ध सभी साक्ष्यों व इलेक्ट्रानिक रिकार्ड पर विचार करने को कहा है।
मामले की सुनवाई जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास और जस्टिस सुधीर कुमार की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता अंकिता प्रधान, पिता रामदास प्रधान, उम्र करीब 25 वर्ष, ग्राम तोषगांव, थाना बसना, जिला महासमुंद की निवासी हैं और वर्तमान में दंतेवाड़ा जिले के बचेली में रह रही हैं। उनकी ओर से अधिवक्ता पुष्पेंद्र कुमार पटेल तथा राज्य की ओर से उप शासकीय अधिवक्ता सौम्य राय उपस्थित हुए। याचिका के अनुसार अंकिता ने दो मार्च 2026 को अंतरजातीय विवाह किया था। विवाह का प्रमाण-पत्र आठ अप्रैल 2026 को जारी हुआ है।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि विवाह के बाद समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उन्हें समुदाय के सामाजिक दर्जे और उससे मिलने वाले अधिकारों का लाभ उठाने से रोक दिया। इस संबंध में उन्होंने पुलिस अधिकारियों से शिकायत की थी। उनका कहना था कि पुलिस ने शिकायत के आधार पर एफआइआर दर्ज की, लेकिन उनके द्वारा नाम बताए गए सभी निजी प्रतिवादियों के नाम एफआइआर में शामिल नहीं किए गए।
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इलेक्ट्रानिक रिकार्ड जांच में लेने की मांग
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उन्होंने जांच अधिकारी के समक्ष कुछ इलेक्ट्रानिक रिकार्ड भी प्रस्तुत किए हैं। इसलिए जांच के दौरान इन रिकार्ड को भी साक्ष्य के रूप में ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने निजी प्रतिवादियों के नाम एफआइआर में शामिल करने और इलेक्ट्रानिक रिकार्ड पर विचार करने के लिए पुलिस को निर्देश देने की मांग की।
एफआइआर में ये धाराएं, जांच शुरुआती चरण में
राज्य की ओर से बताया गया कि जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और जांच अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई कर रहा है। याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों और प्रस्तुत इलेक्ट्रानिक रिकार्ड की जांच भी विवेचना के दौरान की जानी है। कोर्ट ने रिकार्ड देखने के बाद पाया कि बसना थाने में अपराध भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(2), 351(2) और 3(5) के तहत भोजराज प्रधान, प्रवीण भोई, धरनीधर साहू, संजय भोई सहित अन्य के खिलाफ दर्ज है। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि एफआइआर में मामले से जुड़े सभी व्यक्तियों के नाम शामिल नहीं हैं।
कोर्ट ने जांच अधिकारी को दी स्वतंत्र जांच की हिदायत
डिवीजन बेंच ने कहा कि चूंकि मामले में जांच पहले से चल रही है, इसलिए इस स्तर पर कोई विशेष निर्देश जारी करना उचित नहीं है। हालांकि कोर्ट ने अपेक्षा की कि जांच अधिकारी स्वतंत्र रूप से जांच करेगा और जांच के दौरान सामने आने वाले संपूर्ण साक्ष्य एवं सामग्री पर विचार करते हुए कानून के अनुसार जांच पूरी करेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के तथ्यों या मेरिट पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। याचिका को इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ निराकृत कर दिया गया।