पीएसीएल घोटाला मामले में पूर्व बीएसएफ कमांडेंट को सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
पीएसीएल घोटाला मामले में पूर्व बीएसएफ डिप्टी कमांडेंट नरिंदर सिंह मेहता को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस आदेश को बर...और पढ़ें
Publish Date: Wed, 16 Sep 2026 08:07:39 PM (IST)Updated Date: Wed, 16 Sep 2026 08:07:39 PM (IST)
प्रतीकात्मक चित्रHighLights
- पूर्व बीएसएफ अधिकारी नरिंदर सिंह मेहता की एसएलपी सर्वोच्च अदालत ने खारिज कर दी।
- छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 23 जून 2026 के फैसले में हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट का इंकार।
- याचिकाकर्ता का नाम चार्जशीट या एफआइआर में नहीं होने के बावजूद गिरफ्तारी की थी आशंका।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। पीएसीएल लिमिटेड से जुड़े कथित बड़े आर्थिक अपराध के मामले में एफआईआर और अब तक दाखिल आरोपपत्र में नाम नहीं होने के बावजूद गिरफ्तारी की आशंका जताकर राहत मांगने वाले 68 वर्षीय पूर्व बीएसएफ डिप्टी कमांडेंट नरिंदर सिंह मेहता को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली।
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 23 जून 2026 के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया और विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा था कि मेहता वर्तमान में न तो एफआईआर में आरोपित हैं और न ही आरोपपत्र में उनका नाम है। केवल भविष्य में गिरफ्तारी या पूरक आरोपपत्र में नाम जुड़ने की आशंका के आधार पर एफआईआर को उनके विरुद्ध खत्म नहीं किया जा सकता।
रायपुर के मौदहापारा थाने में 22 जनवरी 2016 को पीएसीएल लिमिटेड के मामलों को लेकर भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409, 120-बी और छत्तीसगढ़ निक्षेपकों के हितों का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 10 के तहत अपराध दर्ज किया गया। अभियोजन के अनुसार कंपनी के निदेशकों और एजेंटों ने निवेशकों से जमीन आवंटन और आकर्षक रिटर्न का वादा कर बड़ी रकम जुटाई, लेकिन वादे पूरे नहीं किए। जांच के बाद 17 सितंबर 2021 को आरोपपत्र दाखिल हुआ।
मामला विशेष सत्र न्यायालय में लंबित है। मेहता का कहना था कि उन्हें 8 फरवरी 2016 को कंपनी का स्वतंत्र निदेशक नियुक्त किया गया था, यानी कथित रकम जुटाने की अवधि के बाद। उनका दावा था कि उनकी भूमिका सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर निवेशकों की रकम लौटाने के लिए गठित जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति की सहायता और न्यायिक निर्देशों के पालन तक सीमित थी। उन्होंने कहा कि सीबीआई और स्थानीय पुलिस की जांच में भी उनके खिलाफ कोई ठोस सामग्री नहीं मिली। उन्होंने 19 एफआईआर दर्ज होने और इनमें से 16 मामलों में जमानत मिलने का भी हवाला दिया।
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हाई कोर्ट ने कहा- आशंका पर जांच नहीं रोकी जा सकती
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 23 जून को धारा 528, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत दायर याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा कि इस धारा की अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल सामान्यतः मौजूदा कार्यवाही में कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जाता है। केवल संभावित भविष्य की कार्रवाई की आशंका पर जांच को पहले से रोकने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर में नाम नहीं होना अपने आप किसी व्यक्ति को भविष्य की जांच से छूट नहीं देता। यदि जांच के दौरान कोई सामग्री सामने आती है तो जांच एजेंसी कानून के अनुसार आगे बढ़ सकती है। मेहता की नियुक्ति, उनकी भूमिका और कथित अपराध से संबंध जैसे सवाल साक्ष्यों के आधार पर उचित स्तर पर तय किए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट का आदेश बरकरार रखा
हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की। 15 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जायमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि हाई कोर्ट के 23 जून के आदेश में हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता। इसके साथ ही विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी गई और लंबित आवेदन भी निपटा दिए गए।