नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। बालोद जिले के जुंगेरा गांव में बैठक के दौरान 30 हजार रुपये का जुर्माना लगाने और गांव से बाहर करने की कथित धमकी के बाद ओमप्रकाश भुआर्य की आत्महत्या के मामले में हाई कोर्ट ने आठ लोगों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमा रद कर दिया है।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से आरोपितों की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने या जानबूझकर मदद करने का कोई ऐसा विशिष्ट कृत्य सामने नहीं आया है, जिसका आत्महत्या से निकट संबंध हो। केवल गांव की बैठक में मौजूद रहने से सभी पर सामूहिक आपराधिक जिम्मेदारी भी तय नहीं की जा सकती।
मामले में मृतक की पत्नी ईश्वरी भुआर्य और बेटे अमित भुआर्य ने आठ लोगों के खिलाफ विशेष न्यायालय में निजी परिवाद पेश किया था। आरोप था कि 10 मई 2024 को गांव की बैठक में ओमप्रकाश पर गांव की लड़कियों के संबंध में कथित अपमानजनक बातें फैलाने और समिति के सदस्यों से गाली-गलौज करने का आरोप लगाते हुए 30 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। रकम नहीं देने पर परिवार को गांव से बाहर करने की धमकी दी गई। इससे ओमप्रकाश मानसिक तनाव और अपमान महसूस कर रहे थे। उन्होंने 16-17 मई की दरमियानी रात घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
परिवाद पर सुनवाई के बाद विशेष न्यायालय ने 23 अप्रैल 2025 को आठों आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 500, 306 के साथ धारा 149 और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ आरोपितों ने अपील की थी। पहले हाई कोर्ट की खंडपीठ ने छह फरवरी 2026 को निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
सात दिन का अंतर और व्यक्तिगत भूमिका का अभाव
अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि बैठक में जुर्माने की राशि शीतला मंदिर में दान के लिए तय की गई थी। मृतक ने बैठक में अपनी बात स्वीकार कर रजिस्टर पर हस्ताक्षर भी किए थे। किसी अपीलकर्ता ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया या जानबूझकर ऐसा दबाव बनाया, इसका कोई प्रमाण नहीं है। पुलिस की जांच में भी आत्महत्या के पीछे पारिवारिक और व्यक्तिगत समस्याओं की बात सामने आई थी।
वहीं, मृतक के परिजनों की ओर से दलील दी गई कि 30 हजार रुपये जमा करने का दबाव बनाया गया और ऐसा नहीं करने पर गांव से बाहर करने की धमकी दी गई थी। इससे परेशान होकर ओमप्रकाश ने आत्महत्या की।
कोर्ट ने इन आधारों पर रद्द किया मामला
हाई कोर्ट ने कहा कि बैठक 10 मई को हुई थी, जबकि आत्महत्या 16-17 मई की दरमियानी रात हुई। आरोपों में किसी खास अपीलकर्ता की भूमिका, उसके द्वारा दी गई धमकी या आत्महत्या के लिए उकसाने वाले किसी सकारात्मक कृत्य का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। 30 हजार रुपये की राशि किसी व्यक्ति के निजी लाभ के लिए मांगे जाने के बजाय मंदिर के लिए सामूहिक रूप से तय किए जाने की बात सामने आई।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मृतक के अनुसूचित जनजाति वर्ग का होने मात्र से अत्याचार अधिनियम की धारा 3(2)(v) लागू नहीं होती। यह दिखाना जरूरी है कि कथित अपराध उसकी जनजातीय पहचान के कारण किया गया। इसी तरह किसी खास अपीलकर्ता की ओर से मानहानिकारक बयान देने का प्रमाण नहीं होने से धारा 500 के आवश्यक तत्व भी नहीं बनते।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223(1) के परंतुक के अनुसार शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था। इन आधारों पर कोर्ट ने विशेष न्यायालय का 23 अप्रैल 2025 का आदेश निरस्त करते हुए आठों अपीलकर्ताओं के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।